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मेरा हिंदी प्रेम on 14 September By Avinash Ranjan Gupta

  मेरा हिंदी प्रेम           भाषाओं के उद्यान में हिंदी ऐसा पुष्प है जो माधुर्य , सौंदर्य और सुगंध से भरपूर है। माधुर्य के कारण हिंदी मिष्ट है। सौंदर्य के कारण हिंदी शिष्ट है। सुगंध के कारण हिंदी विशिष्ट है। माधुर्य , हिंदी का शिवम् ‌ है। सौंदर्य , हिंदी का सुंदरम् ‌ है। सुगंध , हिंदी का सत्यम् ‌ है। जिस भाषा में केवल गुणों के ही खान हों उस भाषा से प्रेम हो जाना तो लाजिमी है। इस भाषा से प्रेम करने वाला मैं अकेला नहीं बल्कि अनगिनत लोग हैं जो जाति , धर्म , देश , संप्रदाय आदि की सीमा को लाँघकर हिंदी के सान्निध्य में आ चुके हैं।           भारत बहुभाषी , बहुधर्मी और धर्म निरपेक्ष देश है। भाषा के नाम पर भारत के अब तक 29 टुकड़े हो चुके हैं जिसे राज्य के नाम से जाना जाता है और विभिन राज्यों को ‘ क ’, ‘ ख ’ और ‘ ग ’ श्रेणी में विभाजित किया गया है बावजूद इसके हमें ‘ ख ’ और ‘ ग ’ श्रेणी में आने वाले राज्यों जैसे- ओडिशा , दक्षिण भारत के राज्य पूर्वोत्तर में सात राज्य जो सात बहनों के नाम से जाने जाते हैं वहाँ भी हिंदी का विकास द्रुत गति से हो रह

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