Putra Prem Par Ek geet By Avinash Ranjan Gupta

पुत्र प्रेम पर एक गीत
उर उल्लसित मन प्रफुल्लित आपकी लीलाओं से,
मोहते हो मन सभी का कृष्ण जैसी कलाओं से।
रूप तेरा है अपूर्व, है अनुभव आशातीत,
मुसकराहट है तुम्हारी जैसी कोई गाथा गीत,
बोली में है प्रीत तेरी, कंठ में तेरे संगीत,
स्पर्श तेरा हर्ष है भरता जैसे ऊष्मा में हो शीत।
उर उल्लसित मन प्रफुल्लित आपकी लीलाओं से,
मोहते हो मन सभी का कृष्ण जैसी कलाओं से।
करते जब भी तुम हो क्रंदन होता है विचलित ये मन,
आत्मा उभय के हरने में हो जाती मगन।
हम है तुममें तुम हो हममें हो भले भिन्न देह से,
बसते हैं इन देहों में रूह तेरे ही इक मोह से ।  
उर उल्लसित मन प्रफुल्लित आपकी लीलाओं से,
मोहते हो मन सभी का कृष्ण जैसी कलाओं से।


अविनाश रंजन गुप्ता 

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