Meera Ke Pad Meera By Avinash Ranjan Gupta


प्रश्नअभ्यास
1 -निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
1 - पहले पद में मीरा ने हरि से अपनी पीड़ा हरने की विनती किस प्रकार की है?
2 - दूसरे पद में मीराबाई श्याम की चाकरी क्यों करना चाहती हैं? स्पष्ट कीजिए।
3 - मीराबाई ने श्रीकृष्ण के रूपसौंदर्य का वर्णन कैसे किया है?
4 - मीराबाई की भाषा शैली पर प्रकाश डालिए।
5 - वे श्रीकृष्ण को पाने के लिए क्याक्या कार्य करने को तैयार हैं?

1.    मीरा ने अपने हरि से निवेदन किया है कि उन्होंने सदा ही अपने भक्तों के दुखों को दूर किया है। मीरा ने तरह-तरह के उदाहरणों को प्रस्तुत किया है जब ईश्वर ने भक्तों की खातिर आश्चर्यजनक रूप से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनकी मदद कर उनकी रक्षा की है।    
2.  दूसरे पद में मीराबाई श्याम की चाकरी करना चाहती है क्योंकि इससे वे अपने ईश्वर की सेवा के साथ-साथ उनके दर्शन व भक्तिभाव का लाभ भी सतत प्राप्त करते रहेंगी।
3.  मीराबाई कहती हैं कि उनके प्रभु श्याम सलोने हैं। उन्होंने पीले वस्त्र पहने हैं तथा माथे पर मोर का पंख मुकुट की भाँति सजा रखा है। गले में फूलों की माला सुशोभित है और होंठों पर अमृत वर्षा करने वाली मुरली उनकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे हैं।     
4.  मीरा ने मेवाड़ी भाषा में अपने पदों की रचना की है। इनके पदों में राजस्थानी भाषा का सहज व सरस रूप उभरकर आता है। इनके पदों में बीच-बीच में गुजराती के कुछ शब्द भी आए हैं। इनकी भाषा आलंकारिक, भावमय, चित्रात्मक, तुकांत और प्रभावशाली है जो कोमल भावनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति के लिए अद्वितीय है।     
5.  मीराबाई श्रीकृष्ण को पाने के लिए उनकी  चाकर बनने को तैयार हैं। वे  श्रीकृष्ण के लिए बाग लगाना चाहती हैं ताकि जब श्रीकृष्ण वहाँ घूमने आएँ तो वे उनके दर्शन पा सकें। वह वृंदावन की गलियों में संन्यासिन बन कर श्रीकृष्ण का लीलगायन करने को भी उत्सुक हैं। वह यमुना के तीर पर कुसुंबी साड़ी पहनकर श्रीकृष्ण की प्रतीक्षा में रात्रि जागरण करने को भी तैयार है।   
(ख) निम्नलिखित पंक्तियों का काव्यसौंदर्य स्पष्ट कीजिए -
1 - हरि आप हरो जन री भीर।
     द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर।
     भगत कारण रूप नरहरि, धरयो आप सरीर।
2 - बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुण्जर पीर।
     दासी मीराँ लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर।
3 - चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमरण पास्यूँ खरची।
     भाव भगती जागीरी पास्यूँ, तीनूं बाताँ सरसी।

1.  मीराबाई श्रीकृष्ण के अनन्य और एकनिष्ठ प्रेम में अभिभूत होकर उनकी लीलाओं व क्षमताओं का भाव-विभोर होकर गुणगान करती हैं। वह कहती हैं कि प्रभु श्रीकृष्ण आपने तो युगों-युगों से अपने भक्तों की पीड़ा को जानकार उसका निवारण किया है। द्रौपदी ने जब कौरवों के अत्याचार से आतंकित होकर आपको पुकारा था तो आपने तुरंत उसका चीर बढ़ाकर उसकी लाज रखी थी। भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए आपने नरहरि का रूप भी धारण कर लिया था।  
2.  मीराबाई श्रीकृष्ण के असीम अनुकंपा से  अभिभूत होकर उनकी लीलाओं व क्षमताओं का भाव-विभोर होकर गुणगान करती हैं। वह कहती हैं कि प्रभु श्रीकृष्ण आपने तो डूबते हुए हाथी तथा मगरमच्छ से भी उसकी रक्षा की थी। गिरि को धारण करके आपने अनेक लोगों को इंद्र के कोप से बचाया था। सब की रक्षा और मदद करने वाले प्रभु मेरी भी पीड़ा दूर करो  
3.  मीरा अपने आराध्य से मनुहार करती हैं कि उन्हें वह अपनी सेविका बना लें। मीरा कहती हैं कि श्याम मुझे अपना नौकर बना लीजिए। मैं दिन-रात अपने स्वामी की सेवा करूँगी। मैं नौकर बनने पर बाग लगाऊँगी। यत्र-तत्र सदा सेवा में तत्पर रहने के कारण मुझे आपके दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होगा और  वृन्दावन की कुंज गलियों में गोविंद का लीलगायन करते हुए अपने जीवन को सफल बनाऊँगी। आपकी सेवा में मुझे आपके दर्शन व स्मरण का लाभ होगा। भक्ति भाव से बड़ी जागीर भला मेरे लिए क्या हो सकती है। मुझे आठों पहर प्रभु के दर्शन, स्मरण व भक्ति का लाभ होगा। इसी को मैं  वेतन और खर्ची स्वरूप स्वीकार करूँगी।

3 -निम्नलिखित में अभिव्यक्त व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए - 
(क)    पढ़ते हैं आदमी ही कुरआन और नमाज़ यां
       और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियाँ
       जो उनको ताड़ता है सो है वो भी आदमी
(ख)   पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
       चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
       और सुनके दौड़ता है सो है वो भी आदमी


क.                       कवि कहते हैं कि जहाँ पर धर्म की बातें सिखाईं जाती हैं वहीं से जूते-चप्पल चुरा लिए जाते हैं  और चुराने वाला चोर भी आदमी ही होता है और उनको देखने वाला भी आदमी ही होता है। अर्थात समाज में समुचित शिक्षा के विविध आयामों में खामियाँ हैं जिसकी वजह से ये सब क्रियाएँ हो रही हैं।   
      
ख.                      कवि कहते हैं कि लोग अपनी अज्ञानता के कारण दूसरों को बेइज़्ज़त करते हैं। यही लोग अपनी समस्या में सहायता के उद्देश्य से चिल्ला कर लोगों को पुकारते हैं और उनकी पुकार को सुनकर मदद की मंशा से जो दौड़ता है वह भी आदमी ही है।इससे यह तो स्पष्ट होता है कि समाज में अनेक तरह के लोग मौजूद हैं पर हमे यह चाहिए कि हम अपनी सोच और सामाजिक स्तर इस तरह का बनाए कि कोई हमारी  बेइज़्ज़ती न कर सके। हमें अपने आप को इस काबिल बनाना चाहिए कि हम दूसरों की भी मदद कर सकें।



Comments

  1. Purani vali site aachi thi Esme language bakava use kari thi so I reguest you to bring older one

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