Dukh Ka Adhikaar Yashpal By Avinash Ranjan Gupta

DUKH KA ADHIKAAR PAATH KA SHABDARTH click here

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एकदो पंक्तियों में दीजिए-
1 -  किसी व्यक्ति की पोशाक को देखकर हमें क्या पता चलता है?
2 -  खरबूज़े बेचनेवाली स्त्री से कोई खरबूज़े क्यों नहीं खरीद रहा था?
3 -  उस स्त्री को देखकर लेखक को कैसा लगा?
4 -  उस स्त्री के लड़के की मृत्यु का कारण क्या था?
5 -  बुढ़िया को कोई भी क्यों उधार नहीं देता?

1.     किसी व्यक्ति की पोशाक को देखकर हमें समाज में उसका दर्जा और अधिकार का पता चलता है और साथ ही साथ उसकी अमीरी- गरीबी की श्रेणी का भी पता चलता है।
2.        खरबूज़े बेचने वाली स्त्री से कोई खरबूज़े नहीं खरीद रहा था क्योंकि वह घुटनों में सिर गड़ाए फफक-फफक कर रो रही थी। उसके बेटे की मृत्यु के से लगे सूतक के कारण लोग इससे खरबूज़े नहीं ले रहे थे।
3.        उस स्त्री को देखकर लेखक के मन में उसके प्रति सहानुभूति की भावना उत्पन्न हुई। उसे देखकर लेखक का मन व्यथित होने लगा। वह नीचे झुक कर उसके दुख का कारण जानना चाहता था तभी उसे लगा कि पोशाक कभी-कभी कितनी बाधा उत्पन्न करती है।
4.        उस स्त्री का लड़का भगवाना एक दिन सुबह-सुबह खेत में से पके खरबूज़े चुन रहा था तभी उसका पैर गीली मेढ़ की तरावट में आराम करते साँप पर पड़ गया और साँप ने उसे डस लिया। इस प्रकार   भगवाना की मृत्यु हो गई।
5.     उस बुढ़िया का बेटा मर चुका था। लोगों को पता था कि  बुढ़िया को अगर उधार दिया जाए तो पैसे मिलने की कोई भी संभावना नहीं है। इसलिए बुढ़िया को कोई भी उधार नहीं दे रहा था।

लिखित
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-
1 -  मनुष्य के जीवन में पोशाक का क्या महत्त्व है?
2 -  पोशाक हमारे लिए कब बंधन और अड़चन बन जाती है?
3 -  लेखक उस स्त्री के रोने का कारण क्यों नहीं जान पाया?
4 -  भगवाना अपने परिवार का निर्वाह कैसे करता था?
5 -  लड़के की मृत्यु के दूसरे ही दिन बुढ़िया खरबूज़े बेचने क्यों चल पड़ी?
6 -  बुढ़िया के दुःख को देखकर लेखक को अपने पड़ोस की संभ्रांत महिला की याद क्यों आई?

1.    हमारे शरीर को ढकना ही पोशाक की सबसे बड़ी उपयोगिता है परंतु  वर्तमान जीवन में मनुष्य की पहचान उसके पोशाक से होने लगी है। यह पोशाक ही मनुष्य को समाज में ऊँचा  स्थान दिलाने के साथ साथ उसके रुत्बे और अधिकार की भी घोषणा करती है।
2.       पोशाक हमारे शरीर को तो ढक देता है मगर हमारे जज़्बातों को नहीं। कभी-कभी हमारे जीवन में हम किसी के दुख से इतने विचलित हो जाते हैं कि उसके दुख का निवारण करने हेतु हमारा अंतर्मन उत्कंठित हो उठता है ऐसे स्थिति में हमारी पोशाक ही अड़चन बन जाती जैसा कि इस पाठ में लेखक यशपाल के साथ होता है।
3.       लेखक उस स्त्री के रोने का कारण नहीं जान पाया क्योंकि इसमें उसकी पोशाक ही रुकावट बन गई थी। उनकी पोशाक इतनी सभ्य थी कि किसी निर्धन बुढ़िया के पास बैठकर उससे उसके दुख के बारे में जानने की अनुमति न तो उसके पोशाक दे रहे थे और न ही उनका तथाकथित सभ्य समाज। उन्हें तो  उसके दुख का पता बाज़ार में खड़े लोगों और आस-पास के दुकानदारों से चला जो बुढ़िया के संबंध में तरह-तरह की बातें कर रहे थे।
4.       भगवाना शहर के पास डेढ़ बीघा ज़मीन पर खेती करके परिवार का निर्वाह करता था। वह कभी-कभी खरबूजों की डलियाँ बाज़ार में बेचने भी जाया करता था। वह घर का एकमात्र सहारा था। वह पूरी लगन से कछियारी करता था और अपने घरवालों का भरण-पोषण किया करता था।
5.       लड़के की मृत्यु के दूसरे दिन बुढ़िया खरबूज़े बेचने चली गई क्योंकि उसके पास जो कुछ भी था भगवाना की मृत्यु के बाद दान-दक्षिणा में खत्म हो चुका था। बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे। बहू बीमार थी। मज़बूरी के कारण बुढ़िया को खरबूज़े बेचने के लिए जाना पड़ा।
6.    बुढ़िया के दुख को देखकर लेखक को अपने पड़ोस की संभ्रांत महिला की याद आई क्योंकि उसके साथ भी ठीक ऐसी ही घटना घटी थी। वह अपने जवान बेटे की मृत्यु के कारण अढ़ाई मास तक पलंग से न उठ सकी थी। पंद्रह-पंद्रह मिनट पर मूर्च्छित हो जाती थी। शहर भर के लोगों के हृदय उसके पुत्र के शोक को देखकर द्रवित हो उठे थे। उसकी अवस्था में सुधार लाने के लिए डॉक्टरों का भी प्रबंध किया गया था। दूसरी तरफ यहाँ लोग बुढ़िया पर ताने कस रहे थे। उसपर तरह-तरह के आरोप लगा रहे थे। ऐसा दृश्य देखकर लेखक को लगा कि दुख मनाने का भी अधिकार होता है। दुख मनाने के लिए भी पर्याप्त पैसे और समय होना चाहिए।

लिखित
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए-
1 -  बाज़ार के लोग खरबूज़े बेचनेवाली स्त्री के बारे में क्याक्या कह रहे थे? अपने शब्दों में लिखिए।
2 -  पासपड़ोस की दुकानों से पूछने पर लेखक को क्या पता चला?
3 -  लड़के को बचाने के लिए बुढ़िया माँ ने क्याक्या उपाय किए?
4 -  लेखक ने बुढ़िया के दुःख का अंदाज़ा कैसे लगाया?
5 -  इस पाठ का शीर्षक ट्टदुःख का अधिकारकहाँ तक सार्थक है? स्पष्ट कीजिए।


1.         पड़ोस की दुकानों के तख्तों पर बैठे या बाज़ार में खडे़ लोग घृणा से उसी स्त्री के संबंध में बात कर रहे थे।एक आदमी ने घृणा से एक तरफ़ थूकते हुए कहा, “क्या ज़माना है! जवान लड़के को मरे पूरा दिन नहीं बीता और यह बेहया दुकान लगा के बैठी है।” दूसरे साहब अपनी दाढ़ी खुजाते हुए कह रहे थे, “अरे जैसी नीयत होती है अल्लाभी वैसी ही बरकत देता है।”
       सामने के फुटपाथ पर खड़े एक आदमी ने दियासलाई की तीली से कान खुजाते हुए कहा,       “अरे, इन लोगों का क्या है? ये कमीने लोग रोटी के टुकड़े पर जान देते हैं। इनके लिए बेटा—बेटी, खसम—लुगाई, धर्म—ईमान सब रोटी का टुकड़ा है।”
       परचून की दुकान पर बैठे लाला जी ने कहा, “अरे भाई, उनके लिए मरे—जिए का कोई    मतलब न हो, पर दूसरे के धर्म—ईमान का तो खयाल करना चाहिए! जवान बेटे के मरने पर तेरह दिन का सूतक होता है और वह यहाँ सड़क पर बाज़ार में आकर खरबूज़े बेचने      बैठ गई है। 
2.         पास—पड़ोस की दुकानों से पूछने पर पता लगा - उसका तेईस बरस का जवान लड़का था। घर में उसकी बहू और पोता—पोती हैं। लड़का शहर के पास डेढ़ बीघा भर ज़मीन में कछियारी करके परिवार का निर्वाह करता था। खरबूज़ों की डलिया बाज़ार में पहुँचाकर कभी लड़का स्वयं सौदे के पास बैठ जाता, कभी माँ बैठ जाती। लड़का परसों सुबह मुँह—अँधेरे बेलों में से पके खरबूज़े चुन रहा था। गीली मेड़ की तरावट में विश्राम करते हुए एक साँप पर लड़के का पैर पड़ गया। साँप ने लड़के को डँस लिया और भगवाना परलोक सिधार गया

3.  लड़के की बुढ़िया माँ बावली होकर ओझा को बुला लाई। झाड़ना—फूँकना हुआ। नागदेव की पूजा हुई। पूजा के लिए दान—दक्षिणा चाहिए। घर में जो कुछ आटा और अनाज था, दान—दक्षिणा में उठ गया। माँ, बहू और बच्चे ‘भगवाना’ से लिपट—लिपटकर रोए, पर भगवाना जो एक दफ़े चुप हुआ तो फिर न बोला। भगवाना परलोक सिधार गया
4.         पुत्रवियोगिनी के दुःख का अंदाज़ा लगाने के लिए पिछले साल अपने पड़ोस में पुत्र की मृत्यु से दुःखी माता की बात सोचने लगा। वह संभ्रांत महिला पुत्र की मृत्यु के बाद अढ़ाई मास तक पलंग से उठ न सकी थी। उन्हें पंद्रहपंद्रह मिनट बाद पुत्रवियोग से मूर्छा आ जाती थी और मूर्छा न आने की अवस्था में आँखों से आँसू न रुक सकते थे। दोदो डॉक्टर हरदम सिरहाने बैठे रहते थे। हरदम सिर पर बरफ़ रखी जाती थी। शहर भर के लोगों के मन उस पुत्रशोक से द्रवित हो उठे थे
5.         मुझे इस पाठ का शीर्षक दुख का अधिकारसटीक लगता है क्योंकि यह कहानी समाज के दो वर्गों का ब्योरा प्रस्तुत करती है, पहला तो शोषित वर्ग जिसका उदाहरण भगवाना और उसका परिवार है और दूसरा शोषक वर्ग जिसका उदाहरण लेखक के पड़ोस की संभ्रांत महिला। दोनों के साथ एक ही प्रकार की घटना घटती है मगर एक के दुख को समझने वाला कोई नहीं बल्कि ताने कस-कस कर उसके दुख को और भी गहरा करते हैं और दूसरी तरफ संभ्रांत महिला के दुख को देखकर लोगों के दिल द्रवित हो उठे थे। ये घटनाएँ साफ़ बयान करती है कि दुख मनाने के लिए भी पैसे और सहूलयित चाहिए जो एक के पास नहीं था और दूसरे के पास था


लिखित
(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए-
1  - जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देतीं उसी तरह खास परिस्थितियों में हमारी पोशाक हमें झुक सकने से रोके रहती है।
2 -  इनके लिए बेटाबेटी, खसमलुगाई, धर्मईमान सब रोटी का टुकड़ा है।
3 -  शोक करने, गम मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और -  -  -  दुःखी होने का भी एक  अधिकार होता है।

1.  प्रस्तुत गद्यांश  में लेखक पोशाक के विषय में वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि जिस प्रकार आकाश में उड़ रहे पतंग को डोर नियंत्रित करती है और जब पतंग कट जाती है तो भी हवा उसे एकाएक ज़मीन पर नहीं गिर जाने देती ठीक ऐसी ही स्थिति पोशाक के कारण होती है। यहाँ लेखक बुढ़िया के दयनीय अवस्था से काफी व्याकुल था और उसके दुख के बारे में जानना चाहता था। वह नीचे झुककर उस गरीब बुढ़िया का दुख बाँटना चाहता था परंतु उनकी पोशाक इसमें बाधा बन रही थी।
2.  प्रस्तुत गद्यांश का आशय यह है कि समाज में अनेक प्रकार के लोग रहते हैं जिनकी मानसिकता काफी विकृत हो चुकी है। उनके लिए सच उतना ही होता है जितना कि वे देख पा रहे हैं। जबकि सच्चाई तो यह होती है कि वे वास्तविक स्थिति से परिचित ही नहीं होते हैं। बिना पूर्ण सत्य का संधान किए मौजूदा हालात पर टीका-टिप्पणी करने लगते हैं जैसा कि यहाँ पर बाज़ार में मौजूद लोग और दुकानदार बुढ़िया पर कर रहे हैं।
3.  इस गद्यांश का आशय यह है कि समाज में दुख मनाने का अधिकार केवल आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों को ही है। यह तो सत्य ही है कि दुख सभी को तोड़ता है। दुख में मातम सभी मनाना चाहते हैं पर ऐसा हो नहीं पाता है। पारिवारिक और आर्थिक संकट गरीबों को दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए मजबूर कर देता है तो दूसरी तरफ आर्थिक रूप से संपन्न परिवार के लोग महीनों तक दुख मानते हैं।




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