Bharat our Vigyaan By Avinash Ranjan Gupta



भारत - विज्ञान और तकनीक
          भारत सदियों से धार्मिक देश रहा है। धर्म की रक्षा और इसके अनुपालन के लिए अर्थ यानी पैसे की ज़रूरत होती है और अर्थ की रक्षा एवं अल्पव्यय के लिए आधुनिक तकनीकों की ज़रूरत होती है जिसमें भारत देश सदा से पीछे रहता हुआ ही नज़र आता है। भारत के इतिहास पर अगर नज़र डाली जाए तो इस बात के पुख्ता प्रमाण मिलने में ज़रा भी देर न लगेगी कि तकनीकों की कमियों के कारण ही आकार और जनसंख्या में छोटे होते हुए भी अनेक देशों ने हम पर समय-समय पर आक्रमण किया और भारत को दम तक लूटा है। तकनीकों की कमी के कारण ही 40 करोड़ की आबादी वाला भारत 3 करोड़ की आबादी वाले देश का 200 वर्षों तक गुलाम बनकर रहा। सदियाँ बीत चुकी हैं इस बात की पुष्टि हुए कि भारत की धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक गुलामी का एक ही कारण रहा है - 'तकनीकों का अभाव'। भारत को तथाकथित आज़ादी मिलने के बाद भी तकनीकों के अभाव के कारण ही चीन ने 1962 में भारत की 640 किलोमीटर ज़मीन पर अपना कब्जा कर लिया और आज स्थिति यह है कि भारत के अपने तीर्थ स्थल मानसरोवर की यात्रा के लिए भी भी हमें चीन से वीज़ा लेना पड़ता है।
          तकनीकों की कमी के कारण ही भारत के कुटीर शिल्प बंद होते जा रहे हैं। तकनीकों की कमी के कारण विदेशी कंपनियाँ भारत के बाज़ार को तहस-नहस कर रही है जिसके फलस्वरूप भारत आर्थिक दलदलों में धँसता नज़र आ रहा है। 1905 में जब भारत में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई थी अगर उसी समय से स्वदेशी चीजों के उत्पादन में अत्यधिक गुणवत्ता और तकनीकों का प्रयोग किया जाता तो आज का भारत कुछ और ही होता। यहाँ तक कि वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीति का जब संसद के बुद्धिजीवियों ने स्वागत किया तब उन्हें कम से कम इस बात का भान होना चाहिए था कि  वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीतियों से उन्हीं देशों को ही ज़्यादा फायदा होने वाला है जो भले ही कम आबादी और कम क्षेत्रफल वाले देश हों मगर तकनीक के मामले में सबसे आगे होंगे।
          आज का भारत एक ऐसा  बाज़ार बन चुका है जहाँ विदेशी व्यापारी व्यापार करने आ रहे हैं और थोड़ा-सा टैक्स देकर सारा धन भारत से विदेशों में ले जा रहे हैं। आज विश्व की सबसे बड़ी-बड़ी कंपनियाँ जो वास्तव में तकनीक के क्षेत्र में काफी ऊँचा नाम रखती है उनके कर्मचारियों में सबसे ज़्यादा आपको भारतीय ही मिलेंगे। भारत एक दूसरी सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश होने के साथ-साथ तीक्ष्ण  बुद्धि पैदा करने वाला देश भी है किन्तु जब आईआईटी और एम टेक करने के बाद भी उन्हें भारत की भूमि में रोज़गार और सम्मान के सुनहरे अवसर नहीं मिलते तो वे विदेशों की तरफ़ रुख करते हैं और तब लोग अपना दुख प्रकाश करते हैं और जगह-जगह भारत से प्रतिभा पलायन के नारे लगाए जाते हैं लेकिन इसकी तह में छिपी समस्या का समाधान करने में अभी भी हम नाकाम हैं।
          125 करोड़ की आबादी वाला यह देश आज तक कितने नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वालों में रवीन्द्रनाथ टैगोर, सी.वी. रमन , अमर्त्य सेन और कैलाश सत्यार्थी और वो भारतीय जिन्होंने समय रहते भारत से पलायन किया उनमें से हरगोविंद खुराना, एस. चन्द्रशेखर, वी.एस. नायपौल,  मुहम्मद युनस और वी. रामकृष्णन जो मूल भारतीयों से कहीं ज़्यादा हैं और 30 करोड़ की आबादी वाला देश अमेरिका अभी तक 270 नोबल पुरस्कार अपने नाम कर चुका है।
         
          दीपक पाण्ड्या चिकित्सा शास्त्र में अच्छी डिग्री प्राप्त करने के बाद भी अमेरिका चले गए क्योंकि उन्हें पता था कि भारत को अभी एक लंबा अरसा लगने वाला है तकनीकी के क्षेत्र में आगे बढ्ने के लिए समय रहते ही उन्होंने सही अनुमान लगाया और अमेरिका में जा बसे और आज उनकी बेटी सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष की दुनिया की जानी-मानी हस्ती बन चुकी हैं जो शायद भारत में कभी संभव नहीं हो पाता।
          तकनीक के अभाव के कारण ही भारत की संस्कृति का लोप हो रहा है और विदेशी संस्कृति का असर सिर चढ़ कर बोल रहा। अभिभावक और शिक्षक अपने बेटे-बेटियों और छात्रों को देखकर सिर पकड़ लेते हैं परंतु वे भी पाश्चात्य संस्कृति के संसर्ग में आ चुके हैं। घर में व्यवहार में लाए जाने वाले अधिकतर बिजली और इलेट्रोनिक्स उपकरण किसी न किसी विदेशी कंपनी के ही आविष्कार हैं। सच तो यह है कि अगर हमें भारतीय संस्कृति और इसकी अस्मिता की रक्षा करनी है तो विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में हमें ज़्यादा से ज़्यादा से तरक्की करनी होगी तभी जाकर विदेशी भी हमारी संस्कृति को अपनाने के लिए लालायित होंगे जैसे कि आज हम उनकी संस्कृति को अपनाने के लिए लालायित हैं।     

इस लेख को लिखने वाले अविनाश रंजन गुप्ता, डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल, बोलानी, के शिक्षक हैं।  

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