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Tuesday, 5 July 2016

Aandolan Ka Chirag - Samaj Shahtra By Avinash Ranjan Gupta



आंदोलन का चिराग – समाज-शास्त्र

छात्र – शुभ प्रभात सर!
शिक्षक –  शुभ प्रभात अरविंद!
छात्र – सर, मैं अपने भविष्य और अपने पेशे के चयन में होने वाली कठिनाइयों की वजह से बहुत परेशान हूँ और आपसे कुछ सलाह चाहता हूँ।
शिक्षक –  ये तो तुम्हारे चेहरे से साफ़ झलक रहा है कि तुम परेशान हो। बोलो मैं तुम्हारी किस तरह से मदद कर सकता हूँ? 
छात्र – सर, 12वीं की परीक्षा तो मैंने पास कर ली, पर अब यह तय नहीं कर पा रहा हूँ कि आगे क्या करूँ। घरवाले इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने पर ज़ोर डाल रहे हैं पर मेरा मन इंजीनियरिंग करने का बिलकुल भी नहीं है। अब आप ही मेरी मदद कीजिए।
शिक्षक – अरविंद, तुम्हारा मस्तिष्क ही तुम्हें सही दिशा की ओर ले जाने के लिए पर्याप्त है बस अपने दिमाग और अंतर्मन की आवाज़ सुनो।  
छात्र – सर, सच कहूँ तो मुझे समाज-सुधारक (Social-Activist) बनने का मन है पर चाह कर भी मैं अपनी मंशा अपने घरवालों को नहीं बता सकता। वे कभी भी इसके लिए राज़ी नहीं होंगे।
शिक्षक – तुम्हारे विचार बहुत ही अच्छे हैं और आज समाज को  समाज-सुधारकों की बहुत आवश्यकता भी है पर ये बताओ कि तुम्हारे मन में ये विचार आया कैसे?
छात्र – सर, आज प्रशासन के लगभग हर विभाग में भ्रष्टाचार, घूसख़ोरी पैर तोड़कर बैठ गई है। पूँजीपतियों का गरीबों का शोषण करना एक आम बात हो गई है। स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी है कि शोषित वर्ग इसे अपनी स्थायी जीवन-शैली (Permanent Life Style) मान बैठा है। रोजगार की इतनी कमी हो गई है कि ज़रूरतमंद अपना आत्म-सम्मान भी गिरवी रखने को तैयार हैं। ये सब सामाजिक असंतुलन का ही परिणाम है जिसका खामियाज़ा केवल और केवल गरीबों को ही भुगतना पड़ता है। हम रहते तो हैं समाज में मगर यहाँ जंगल का कानून लागू होता है जिसमें सरवाइवल ऑफ द फिटटेस्ट (Survival of the fittest)की नीति काम करती है। इन्हीं सभी कारणों की वजह से मैं समाज-सुधारक (Social-Activist) बनना चाहता हूँ।
शिक्षक –  सचमुच, अरविंद, तुहारी सोच और आज के ज़माने को परखने का नजरिया तथा उसमें निहित कमियों को ढूँढ़ निकालने का हुनर बेजोड़ है। तुमने बहुत ही बारीकी से समाज की विसंगतियों का अध्ययन किया है पर तुम्हारे लिए ये भी जानना बहुत ज़रूरी है कि आज-कल सरवाइवल ऑफ द फिटटेस्ट (Survival of the fittest) की नीति काम नहीं करती बल्कि सरवाइवल ऑफ द क्रूएलेस्ट (Survival of the Cruelest) की नीति काम करती है। अगर फिटटेस्ट पर्सन फिट है मगर क्रूएल नहीं तो समाज के अन्य क्रूएल लोग उस पर हावी होकर उसे दरकिनार कर देंगे। शेर फिट होने के साथ-साथ क्रूएल भी होता है इसी वजह से जंगल पर उसका राज चलता है जबकि हाथी फिट तो है परंतु क्रूएल नहीं जिसकी वजह से विशालकाय होते हुए भी जंगल में उसकी नहीं चलती। 
छात्र – तो सर, मैंने जो भी सामाजिक समस्याओं को सामने रखा है इन सबका मूल कारण क्या है?
शिक्षक – आज जितने भी सामाजिक समस्याओं से हम ग्रसित हैं इन सबके पीछे केवल और केवल पाँच ही मूल कारण हैं – ईर्ष्या, काम, धन, धर्म और अशिक्षा (Jealousy, Sex, Wealth, Religion and Illiteracy)। इन्हीं पाँच कारणों की वजह से सामाजिक घाव जैसे – भ्रष्टाचार, घूसख़ोरी, शोषण, यौन शोषण, बाल-श्रम, मानसिक तनाव सामाजिक नासूर बन चुके हैं जिसे दवाई से ठीक करना मुमकिन नहीं बल्कि ओपेरेशन से समाज से बाहर निकाल फेंकना होगा।
छात्र – सर, तो हम किस प्रकार सामाजिक नासूर को समाज से बाहर निकाल सकते हैं?
शिक्षक –  अरविंद, ये काम इतना आसान नहीं है मगर हाँ, वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी को सही शिक्षा देकर हम अपने लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं।
छात्र – सही शिक्षा से आपका क्या उद्देश्य है, सर? आज के ज़माने में तो शिक्षा दर (Literacy Rate) पिछले वर्ष की तुलना से बढ़ता ही जा रहा है।   
शिक्षक –  जिस प्रकार शिक्षा दर (Literacy Rate) पिछले वर्ष की तुलना से बढ़ता ही जा रहा है। उसी अनुपात में असामाजिक गतिविधियाँ भी बढ़ती जा रही है जबकि होना तो यह था कि शिक्षा दर बढ़ने के साथ-साथ असामाजिक गतिविधियाँ कम होनी थीं पर ऐसा नहीं हुआ जिसका मतलब है- शिक्षा-व्यवस्था में कहीं-न-कहीं कोई खामी है।
छात्र – सर, आज की शिक्षा का नियामक है- ज़्यादा से ज़्यादा पर्सेंटेज।
शिक्षक –  “सा विद्या या विमुक्तये” अर्थात, विद्या वह है जो मनुष्यों को बंधनों से मुक्त करे परंतु वर्तमान शिक्षा मनुष्य को और भी बंधनों में जकड़ती जा रही है जिसकी वजह से संस्कृत का महान वाक्य “वसुधैव कुटुंबकं” यानि सारा संसार ही एक परिवार है, यह  उक्ति निरर्थक हो चुकी है। अब स्थिति तो यह हो चुकी है कि एक संसार में अनगिनत परिवार बन चुके हैं क्योंकि तथाकथित (So-called) शिक्षित व्यक्ति अपने परिवार की भलाई के अलावा कुछ और सोचते ही नहीं हैं।
छात्र – तो सर क्या हम अध्यात्मिकता और साहित्य के माध्यम से समाज में सुधार ला सकते हैं?
शिक्षक –  तुम सही कह रहे हो अरविंद, परंतु अध्यात्मिकता और साहित्य सुधार लाने में उतने समर्थ साबित नहीं होंगे। हमारा देश हमेशा से अध्यात्मिकता और साहित्य के क्षेत्र में विश्वश्रेष्ठ रहा है। इस पावन भूमि पर गौतम बुद्ध और स्वामी विवेकानंद जैसे महान पुरुषों ने अध्यात्मिकता, एकता, भाईचारा का पाठ पढ़ाने में कोई कसर न छोड़ी परंतु आज के समाज में उनके द्वारा पढ़ाए गए अध्यात्मिकता, एकता, भाईचारे का पाठ केवल किताबों तक ही सीमित रह गया है जिसे कोई खरीदता नहीं अगर किसी ने खरीद लिया तो पढ़ता नहीं अगर पढ़ लिया तो उसे अपने जीवन में उतारता नहीं।
छात्र – तब किस प्रकार से समाज को सुधारा जा सकता है सर?
शिक्षक –  सामाज शास्त्र के अध्ययन और अध्यापन से।
छात्र – सामाज शास्त्र के अध्ययन और अध्यापन से वो कैसे सर?
शिक्षक –  लोगों को उनके कर्तव्यों और अधिकारों के बारे में सही जानकारी देकर। उन्हें जब उनके अधिकारों का पूरा-पूरा ज्ञान होगा तो वे अपने अधिकारों के लिए लड़ने को तैयार हो जाएँगे तथा प्रशासन के अधिकारी को भी अपने काम को सही से पूरा न करने पर दंड के प्रावधान का भय उन्हें अपने काम को सही तरीके से करने पर बाध्य करेगा। 
छात्र – परंतु सर समाज और कानून का डर तो अभी भी समाज में व्याप्त है।
शिक्षक –  हाँ, डर तो है मगर सामाजिक नीति-नियमों को भंग करने पर मिलने वाले दंड का नहीं बल्कि उस दंड से बचने के लिए अधिकारियों को दी जाने वाली घूस की रकम की और दूसरी तरफ़ साधारण व्यक्ति को इस बात का डर है कि अगर उसने अन्याय के खिलाफ़ अपनी आवाज़ उठाई तो कहीं उसकी आवाज़ को दबा न दिया जाए। कहीं उसकी नौकरी न चली जाए। कहीं उसके परिवार वाले सड़क पर न आ जाए।
छात्र – सर, आम जनता की यही मूर्खता और कायरता की वजह से आज समाज की यह दुर्दशा है।
शिक्षक –  नहीं अरविंद, आम जनता मूर्ख या कायर नहीं है अगर वो अपनी आवाज़ नहीं उठाते हैं तो इससे उनको भी हानि पहुँचती हैं परंतु आज का समाज कुछ ऐसा हो गया है कि जिस पर विश्वास किया जाता है वही विश्वासघात कर बैठता है, दूसरी बात आम जनता को अपने अधिकारों तथा उसे पाने के तरीका पता ही नहीं है जिसका नाजायज फायदा उठाकर सरकारी कर्मचारी और पूँजीपति उनका शोषण करते रहते हैं। तीसरी बात आम जनता हमेशा से अपने आपको पारिवारिक बंधनों में पाती है। चाहकर भी वे ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकते जिससे उनके परिवारवाले समस्या में आ जाएँ। उनका पूरा समय तो अपनी जरूरतों को पूरा करने में ही लग जाता है। समाजसुधार या उसके लिए कुछ करने  का ख्याल भी उनके दिमाग तक नहीं पहुँच पाता है। मगर जब समाज का ऐसा सुशिक्षित वर्ग जो हर प्रकार की सुविधाओं का उपभोग करता है और अन्याय के खिलाफ आवाज़ केवल इसलिए नहीं उठाता क्योंकि इससे उनका कोई सरोकार नहीं तो उन्हें मैं शिक्षित मूर्ख और क्लीव की संज्ञा दूँगा।
छात्र – तो सर समाज को सुधारने का प्रयास हमें कहाँ से करना चाहिए? कॉलेजों से या विश्वविद्यालयों से
शिक्षक –  अरविंद, Creation is better than correction। हमें इसकी शुरूआत विद्यालय स्तर से ही करनी चाहिए।  
छात्र – परंतु सर आज की दुनिया में शिक्षक के साथ-साथ माता-पिता भी अपने बच्चों का उज्ज्वल और सुरक्षित भविष्य विज्ञान की शिक्षा देने में ही समझते हैं। 
शिक्षक –  इसका कारण भी विज्ञान ही है। आज विज्ञान ने इतने अद्भुत आविष्कार कर दिए हैं कि एक बड़ा जनसमुदाय इसकी चपेट में आ गया है और सभी अपने जीवन को ज़्यादा से ज़्यादा सामानों से भरना चाहते हैं। चूँकि, विज्ञान झूठी प्रगति का माध्यम माना जाता है इसलिए सभी विज्ञान पढ़कर अपने जीवन को आर्थिक रूप से सुरक्षित करना चाहते हैं। परंतु आज के समाज के बिगड़ते हालात को विज्ञान उतने अंश तक नहीं सुधार सकता जितना कि समाज-शास्त्र।   
छात्र – लेकिन सर विज्ञान के माध्यम से भी तो समाज में सुधार लाया जा सकता है। विज्ञान की तकनीकों का प्रयोग करके हम प्रशासन व्यवस्था को सुधार सकते हैं।
शिक्षक –  तुम सही कह रहे हो अरविंद, परंतु एक हद तक। विज्ञान की तकनीकों पर भी लगाम लगाना बहुत ज़रूरी है नहीं तो ये दुनिया रहने लायक रहेगी ही नहीं। नि:संदेह, विज्ञान ने हमें बहुत कुछ दिया है परंतु ये विज्ञान ही है जिसकी वजह से ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन, ओज़ोन परत में छिद्र जैसे संकट पैदा हो रहे हैं। मैं तुम्हें कुछ नाम बोल रहा हूँ तुम्हें ये बताना है कि तुम कितने नामों से परिचित हो – सर महात्मा गाँधी, हरगोविंद खोराना, सुबास चन्द्र बोस, सी.वी. रामन, लाल बहादुर शास्त्री, नेल बोर, सी.वी. रामन ।    
छात्र – सर महात्मा गाँधी, सुबास चन्द्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, सी.वी. रामन
शिक्षक –  तुमने जितने भी नाम लिए उनमें से सी.वी. रामन के अलावा सभी समाज-सुधारक की भूमिका में काम करते थे।
छात्र – इसका अर्थ क्या हुआ सर? 
शिक्षक –  इसका अर्थ यह हुआ कि बेहतर समाज के लिए समाज के नीति-नियमों का अनुपालन सही से होना चाहिए। कानून-व्यवस्था और दंड-विधान सभी के लिए एक होना चाहिए इसीलिए हम इतिहास में पढ़ते हैं कि राम- राज्य में प्रजा बहुत खुश रहा करती थी। चन्द्रगुप्त और विक्रमादित्य के शासनकाल  को स्वर्णकाल कहा जाता था क्योंकि उस समय की शासन व्यवस्था प्रजा के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाती थी। बेहतर समाज की स्थापना में विज्ञान का स्थान सदैव दूसरा होता है और समाज शास्त्र का पहला, यही कारण है कि वैज्ञानिकों से भी वे व्यक्ति ज़्यादा प्रसिद्धि प्राप्त कर पाते हैं जो समाज बेहतर से बेहतरीन बनाने के प्रयास में लगे रहते हैं।    
छात्र – सर, मैं भी समाज-शास्त्र का अध्ययन करना चाहता हूँ और समाज को सभी वर्गों के लिए बेहतर जीवन-यापन करने लायक बनाना चाहता हूँ। 
शिक्षक –  तुम्हारी सोच अच्छी है परंतु तुम्हें समाज-शास्त्र का अध्ययन पूरी गहनता से करना होगा। समाज-शास्त्र के अध्ययन के दौरान तुम्हें जो भी कमियाँ दिखाई देंगी उसकी आलोचना करने के साथ-साथ उसके लिए नई नीतियों का ब्योरा भी तुम्हें तैयार करना होगा।
छात्र – उदाहरण के तौर पर, सर।
शिक्षक –  उदाहरण के लिए सरहद पर तैनात जवान को अपने बूढ़े माँ-बाप और बीमार पत्नी से मिलने के लिए दो दिनों की छुट्टी भी मिलने में लंबा समय लग जाता है और जेलों में बंद भ्रष्टाचार और देशद्रोह के मामले में सज़ा काट रहे अपराधियों को 15-15 दिनों का पेयरोल आसानी से मिल जाता है।
भारत में सदियों से गायों को माता का दर्जा दिया जाता है और यहीं की सरकार कत्लखानों को लाइसेंस देती है। जब हिरण को मारने पर मुकदमा चलाया जाता है तो गाय को मारने पर क्यों नहीं। ये कैसा कानून है। इसमें संशोधन की नितांत आवश्यकता है। आज भी हमारे संविधान में ऐसे बहुत सारे कानून हैं जिसे बदलने की आवश्यकता है परंतु समाज के पढ़े-लिखे लोग जिनके मस्तिष्क भोग-लिप्सा के किटाणु से संक्रमित हो चुके हैं उन्हें इनकी सुध ही नहीं है। ऐसे में तुम्हारा काम और भी कठिन हो जाएगा।
छात्र – सर, मुझे तो यह पता चल ही गया है कि यह काम इतना आसान नहीं है। इसके लिए मुझे एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना पड़ेगा परंतु मुझे खुशी इस बात की है कि अगर मैंने इस काम को अच्छे से पूरा कर दिया तो सामाजिक बीमारियाँ जैसे- शोषण, यौन शोषण, भ्रष्टाचार आदि रोगों से समाज को मुक्ति मिल जाएगी।
शिक्षक –  तुहारी सोच और समझ बहुत ही उम्दा है पर मैं तुम्हें एक खतरे से भी आगाह करना चाहता हूँ।
छात्र – खतरा! कैसा खरा सर?
शिक्षक –  चीटर्स और चीटेड नीति का। पहले के समय में चीटर्स चीटेड लोगों की तारीफ़ कर कर उन्हें लूटा करते थे और यह प्रचलन आज भी चल रहा है जिसका जीता-जागता रूप हमें बाज़ारों में देखने को मिलता है परंतु बदलते हालातों के साथ स्थिति का उलटफेर भी देखने को मिलता है जब चीटेड चीटर्स लोगों की तारीफ़ किया करते करते हैं। उदाहरण के तौर पर अमेरिका देश और वहाँ के शासन व्यवस्था की सभी तारीफ़ करते हैं पर आज के दौर में सारे दुनिया के सामने जितने भी प्राकृतिक और सामाजिक समस्या मुँह बाए खड़ी है उनमें से सबसे ज़्यादा भागीदारी अमेरिका की ही है। 
छात्र – वो कैसे सर?
शिक्षक –  जब तुम अपने पाठ का गहन अध्ययन करना शुरू कर दोगे तो ये सारी बातें पानी की तरह साफ हो जाएँगी।
छात्र – सर, मैं आपकी बातों से पूर्णत: प्रेरित हो चुका हूँ पर आप मुझे यह भी बताइए कि अगर कभी मेरा उत्साह धीमा पड़ जाए, अगर कभी मेरे विचारों पर व्यक्तिगत लाभ की सोच हावी होने लगे तो मुझे क्या करना चाहिए?
शिक्षक –  अरविंद, प्रकृति के अलावा आज तक किसी भी प्राणी के लिए यह शत-प्रतिशत कभी भी संभव हो ही नहीं पाया है और न हो पाएगा कि वो हमेशा एक गति से अपने जीवन में बढ़ सकें। अपने लक्ष्य तक पहुँचने के दौरान जब कभी भी तुम अपने आपको भटका हुआ महसूस करो तो तीर्थ यात्रा पर निकाल जाना।
छात्र – तीर्थ यात्रा
शिक्षक –  अरविंद, तुम्हारे तीर्थ स्थल राजघाट, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में स्थित कालापानी जेल का सावरकर सेल, चंडीगढ़ जेल का वो सेल होगा जिसमें जय प्रकाश नारायण की मौत हुई थी। राँची जेल का वह सेल जिसमें बिरसा मुंडा की मौत सही उपचार न होने की वजह से हुई थी। जब तुम ऐसे जगहों के दर्शन करोगे तो उनकी आत्माएँ चीख-चीख कर तुमसे उनके अधूरे सपने को पूरा करने की गुहार लगाएगी। 
छात्र – सचमुच सर, आज से मेरे तीर्थ स्थल इन्हीं क्रांतिकारियों के समाधि स्थल है।
शिक्षक –  और अंत में सिर्फ तुमसे इतना ही कहना चाहूँगा कि किसी भी विवाद पर जहाँ तक हो सके तुरंत कार्रवाई करने की कोशिश करना ताकि बाद में उस विवाद में मिर्च मसाला-लगाकर फिल्म निर्माता फिल्म बनाकर करोड़ों रुपए न बना सकें। 
छात्र – जी सर मैं पूरा ध्यान रखूँगा।
                                                                                                                                                अविनाश रंजन गुप्ता