Hindi Language Promotion and Development

Tuesday, 21 June 2016

Tu Apni Ek Pahchaan Bana By Avinash Ranjan Gupta

तू अपनी एक पहचान बना

तू अपनी एक पहचान बना
पदचिह्नों के निशान बना
मत भाग परिचितों के पीछे
न बन हिस्सा तू भीड़ का
शांत बैठ और खुद से पूछ
क्या बालक है तू नीड़ का
दुनिया तेरी राह है देखती
तुझमे आशा की दीप है जलती
क्या अब जान नहीं पाया तू
क्यों तू इस धरती पर है जना
तू अपनी एक पहचान बना
पदचिह्नों के निशान बना
न सोच तेरी हद है क्या
न सोच तेरी कद है क्या
न सोच तेरा रूप है कैसा
न सोच रास्ता होगा कैसा
बस जुनून को ज़िंदा रखकर
कर्मक्षेत्र पर अभी उतरकर
नए-नए कीर्तिमान बना
अपने जीत की जयगाथा को
अग्र जीत का आग बना
तू अपनी एक पहचान बना
पदचिह्नों के निशान बना
दुनिया तुझको भी देखेगी
भीड़ लगाकर खड़ी रहेगी
ये मुमकिन है उसी घड़ी जब
अडिग रहे तू पथ पर अपने
चाहे जितनी आए बाधाएँ
कदमों को न देना रुकने
साथ भले ही न हो किसी का
ओझल न हो आँखों से सपने
ठान लिया है गर तूने ये
है अपने नाम का लोहा मनवाना
तू अपनी एक पहचान बना
पदचिह्नों के निशान बना
                                    अवविनाश रंजन गुप्ता