Baal Kavita on Ganga गंगा जी


गंगा जी
गंगा कहाँ बही जाती हो ?
चली कहाँ से तुम आती हो ?
जाने कब से खेल रही हो ?
क्या न जरा तुम सुस्ताती हो ?
मिली कहाँ से यह जल-धारा ?
कैसे यह बन गया किनारा ?
किसका किसका मन हरने को
दिया काट यह नया कगारा ?
कैसी लहरें लहराती हो ?
चमचम बालू चमकाती हो ।
क्या रोती है कोई लड़की ?
जिसका मन तुम बहलाती हो ?
हँस-मुख भेष बनाया कैसे ?
कब से थिरक रही हो ऐसे ?
नए खिलौने लाने के हित
मिले तुम्हें भी क्या कुछ पैसे ?
जो गंगा है नभ में ऊपर,
जो तुमको छोरों पर छूकर ।
आधी रात हँसा करती है,
क्या तुम उसकी भगिनी भू पर?
अगणित नावें तुम पर चलतीं,
अगणित जानें तुम में पलतीं।
उछल खुशी से मैं जाता हूँ,
जब-जब हैं मछलियाँ उछलती ।।
तज सकता भू का सुख सारा,
दे सकता निज जीवन प्यारा ।
पर न कभी मैं रह सकता हूँ,
कर तुमको नयनों से न्यारा ।


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