नाटक के तत्त्व By Avinash Ranjan Gupta


नाटक के तत्त्व
भारतीय काव्य शास्त्र के अनुसार दृश्य-श्रव्य काव्य के छह मुख्य तत्त्व माने गए हैं-1. वस्तु अथवा कथावस्तु 2. चरित्र चित्रण 3.कथोपकथन-संवाद 4.देशकाल 5. भाषा शैली 6. उद्देश्य।
(1) वस्तु अथवा कथावस्तु - विभिन्न साहित्यिक विधाओं की तरह नाटक की कथावस्तु भी बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। नाट्य-शास्त्र में वही कथानक उत्तम माना गया हैं, जिसमें सर्वभाव, सर्वरस तथा सर्वकर्मों की प्रवृत्तियाँ तथा विभिन्न अवस्थाओं का विधान हो। नाटक की कथावस्तु में औदात्य (Greatness) एवं औचित्य (Justification) का पूरा-पूरा ध्यान रखना पड़ता है। जो अंश इसके विरुद्ध जा रहे हों, उन्हें त्याग देना चाहिए।
(2) चरित्र चित्रण -नाटक का दूसरा महत्त्वपूर्ण तत्त्व पात्र है। इनके सहारे ही कथानक आगे बढ़ता है। नाटक की सफलता उसके सजीव एवं स्वाभाविक पात्र के नियोजन पर निर्भर करती है। अत:, नाटककार को चरित्र-चित्रण में बड़ी सावधानी से काम लेना पड़ता है। नाटक का नायक प्रधान पुरुष होता है जो फल की प्राप्ति करता है। उसे मधुर, विनयी, त्यागी, मिष्टभाषी, लोकप्रिय, उच्चवंशी, युवा, उत्साही, दृढ़, तेजस्वी, कलाप्रिय, शास्त्रज्ञ और धार्मिक होना चाहिए । नाटक की प्रधान नारी पात्र नायिका कहलाती है। नायिका के गुण नायक के समान ही होने चाहिए।
(3) कथोपकथन-संवाद -कथोपकथन नाटक का प्राणतत्त्व है। कथोपकथन के अभाव में नाटक की कल्पना तक नहीं हो सकती। वे पात्रानुरुप तथा प्रसंग-परिस्थिति के अनुकूल होने चाहिए। संवाद जितने सार्थक, संक्षिप्त और समर्थ होते हैं, नाटक उतना ही सफल माना जाता है।संवादों की भाषा सरल, सुबोध तथा प्रवाहमयी होनी चाहिए।
(4) देशकाल -नाटक में देशकाल का निर्वाह भी होना चाहिए। इस तत्त्व का निर्वाह अभिनय, दृश्य-विधान, पात्रों की वेशभूषा, आचार-विचार, संस्कृति, रीति रिवाज आदि के द्वारा होता हैं। देशकाल के प्रयोग से नाटक जीवन्त हो उठते है। सफल नाटककार दृश्यविधान, मंच व्यवस्था, वेशभूषा और अभिनय आदि के द्वारा सजीव वातावरण की सृष्टि कर लेता है।
(5) भाषा शैली- नाटक चूँकि एक दृश्य विधा है, इसलिए दर्शक संवादों के द्वारा ही कथा को ग्रहण करता है। अत: नाटक की भाषा सरल, स्पष्ट और सजीव हानी चाहिए। भिन्न-भिन्न  पात्रों की श्रेणी, योग्यता तथा परिस्थिति के अनुसार भाषा का रूप होना चाहिए। पात्रानुकूल भाषा नाटक में सौन्दर्य वृद्धि करती है। उसे प्रसाद, ओज और माधुर्य गुण समन्वित होना चाहिए। साथ ही उसे कलात्मक एवं प्रभावशाली भी होना चाहिए। नाटक में अति अलंकृत भाषा अधिक रुचिकर नहीं होती।
(6) उद्देश्य -नाटककार किसी न किसी उद्देश्य को लेकर चलता है। वैसे भारतीय शास्त्र में पुरुषार्थ चतुष्टय (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) को नाटक का मुख्य उद्देश्य माना जाता है। अन्य एक नाट्य उद्देश्य रस-अनुभूति कराना भी है। सरल भाषा में नाटक का उद्देश्य ज्ञानाधारित मनोरंजन करवाना है।

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