Prashn 2

लिखित
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-
1 -  मनुष्य के जीवन में पोशाक का क्या महत्त्व है?
2 -  पोशाक हमारे लिए कब बंधन और अड़चन बन जाती है?
3 -  लेखक उस स्त्री के रोने का कारण क्यों नहीं जान पाया?
4 -  भगवाना अपने परिवार का निर्वाह कैसे करता था?
5 -  लड़के की मृत्यु के दूसरे ही दिन बुढ़िया खरबूज़े बेचने क्यों चल पड़ी?
6 -  बुढ़िया के दुःख को देखकर लेखक को अपने पड़ोस की संभ्रांत महिला की याद क्यों आई?

1.    हमारे शरीर को ढकना ही पोशाक की सबसे बड़ी उपयोगिता है परंतु  वर्तमान जीवन में मनुष्य की पहचान उसके पोशाक से होने लगी है। यह पोशाक ही मनुष्य को समाज में ऊँचा  स्थान दिलाने के साथ साथ उसके रुत्बे और अधिकार की भी घोषणा करती है।
2.       पोशाक हमारे शरीर को तो ढक देता है मगर हमारे जज़्बातों को नहीं। कभी-कभी हमारे जीवन में हम किसी के दुख से इतने विचलित हो जाते हैं कि उसके दुख का निवारण करने हेतु हमारा अंतर्मन उत्कंठित हो उठता है ऐसे स्थिति में हमारी पोशाक ही अड़चन बन जाती जैसा कि इस पाठ में लेखक यशपाल के साथ होता है।
3.       लेखक उस स्त्री के रोने का कारण नहीं जान पाया क्योंकि इसमें उसकी पोशाक ही रुकावट बन गई थी। उनकी पोशाक इतनी सभ्य थी कि किसी निर्धन बुढ़िया के पास बैठकर उससे उसके दुख के बारे में जानने की अनुमति न तो उसके पोशाक दे रहे थे और न ही उनका तथाकथित सभ्य समाज। उन्हें तो  उसके दुख का पता बाज़ार में खड़े लोगों और आस-पास के दुकानदारों से चला जो बुढ़िया के संबंध में तरह-तरह की बातें कर रहे थे।
4.       भगवाना शहर के पास डेढ़ बीघा ज़मीन पर खेती करके परिवार का निर्वाह करता था। वह कभी-कभी खरबूजों की डलियाँ बाज़ार में बेचने भी जाया करता था। वह घर का एकमात्र सहारा था। वह पूरी लगन से कछियारी करता था और अपने घरवालों का भरण-पोषण किया करता था।
5.       लड़के की मृत्यु के दूसरे दिन बुढ़िया खरबूज़े बेचने चली गई क्योंकि उसके पास जो कुछ भी था भगवाना की मृत्यु के बाद दान-दक्षिणा में खत्म हो चुका था। बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे। बहू बीमार थी। मज़बूरी के कारण बुढ़िया को खरबूज़े बेचने के लिए जाना पड़ा।
6.    बुढ़िया के दुख को देखकर लेखक को अपने पड़ोस की संभ्रांत महिला की याद आई क्योंकि उसके साथ भी ठीक ऐसी ही घटना घटी थी। वह अपने जवान बेटे की मृत्यु के कारण अढ़ाई मास तक पलंग से न उठ सकी थी। पंद्रह-पंद्रह मिनट पर मूर्च्छित हो जाती थी। शहर भर के लोगों के हृदय उसके पुत्र के शोक को देखकर द्रवित हो उठे थे। उसकी अवस्था में सुधार लाने के लिए डॉक्टरों का भी प्रबंध किया गया था। दूसरी तरफ यहाँ लोग बुढ़िया पर ताने कस रहे थे। उसपर तरह-तरह के आरोप लगा रहे थे। ऐसा दृश्य देखकर लेखक को लगा कि दुख मनाने का भी अधिकार होता है। दुख मनाने के लिए भी पर्याप्त पैसे और समय होना चाहिए।

Comments

Post a Comment