Chapter – 12 द्वादशः पाठः वाङ्मनःप्राणस्वरूपम् Dwadash Paatha: Wangman Pranaswarupam NCERT Shemushi Class IX (Subject Code-122)


द्वादशः पाठः
वाङ्मनःप्राणस्वरूपम्
प्रस्तुत पाठ छान्दोग्योपनिषद् के छठे अध्याय के पञ्चम खण्ड पर आधारित है। इसमें मन, प्राण तथा वाक् (वाणी) के संदर्भ में रोचक विवरण प्रस्तुत किया गया है। उपनिषद् के गूढ़ प्रसंग को बोधगम्य बनाने के उद्देश्य से इसे आरुणि एवं श्वेतकेतु के संवादरूप में प्रस्तुत किया गया है। आर्षपरंपरा में ज्ञानप्राप्ति के तीन उपाय बताए गए हैं जिनमें परिप्रश्न भी एक है। यहाँ गुरुसेवापरायण शिष्य वाणी, मन तथा प्राण के विषय में प्रश्न पूछता है और आचार्य उन प्रश्नों के उत्तर देते हैं।
श्वेतकेतुः भगवन्! श्वेतकेतुरहं  वन्दे।
आरुणिः वत्स! चिरञ्जीव।
श्वेतकेतुः भगवन्! किञ्चित्प्रष्टुमिच्छामि।
आरुणिः वत्स! किमघ त्वया प्रष्टव्यमस्ति?
श्वेतकेतुः भगवन्! प्रष्टुमिच्छामि किमिदं मनः?
आरुणिः वत्स! अशितस्यान्नस्य योऽणिष्ठः तन्मनः।
श्वेतकेतुः कश्च प्राणः?
आरुणिः पीतानाम् अपां योऽणिष्ठः स प्राणः।
श्वेतकेतुः भगवन्! केयं वाव्Q?
आरुणिः वत्स! अशितस्य तेजसा योऽणिष्ठः सा वाक्। सौम्य! मनः अन्नमयं, प्राणः आपोमयः वाक् च तेजोमयी भवति इत्यप्यवधार्यम्।
श्वेतकेतुः भगवन्! भूय एव मां विज्ञापयतु।
आरुणिः सौम्य! सावधानं शृणु। मथ्यमानस्य दध्नः योऽणिमा, स ऊर्ध्वः समुदीषति। तत्सर्पिः भवति।
श्वेतकेतुः भगवन्! व्याख्यातं भवता घृतोत्पत्तिरहस्यम्। भूयोऽपि श्रोतुमिच्छामि।
आरुणिः एवमेव सौम्य! अश्यमानस्य अन्नस्य योऽणिमा, स ऊर्ध्वः समुदीषति। तन्मनो भवति। अवगतं न वा?
श्वेतकेतुः सम्यगवगतं भगवन्!
आरुणिः वत्स! पीयमानानाम् अपां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स एव प्राणो भवति।
श्वेतकेतुः भगवन्! वाचमपि विज्ञापयतु।
आरुणिः सौम्य! अश्यमानस्य तेजसो योऽणिमा, स ऊर्ध्वः समुदीषति। सा खलु वाग्भवति। वत्स! उपदेशान्ते भूयोऽपि त्वां विज्ञापयितुमिच्छामि यदन्नमयं
भवति मनः, आपोमयो भवति प्राणस्तेजोमयी च भवति वागिति। किञ्च यादृशमन्नादिकं गृह्णाति मानवस्तादृशमेव तस्य चित्तादिकं भवतीति मदुपदेशसारः। वत्स! एतत्सर्वं हृदयेन अवधारय।
श्वेतकेतुः यदाज्ञापयति भगवन्। एष प्रणमामि।
आरुणिः वत्स! चिरञ्जीव। तेजस्वि नौ अधीतम् अस्तु।


शब्दार्थाः
प्रष्टुम्             प्रश्नं कर्तुम्                         प्रश्न करने/पूछने के लिए
प्रष्टव्यम्         प्रष्टुं योग्यम्                        पूछने योग्य
अशितस्य      भक्षितस्य                          खाये हुए का
अणिष्ठः         लघिष्ठः, लघुतमः               अत्यन्त लघु अथवा सर्वाधिक लघु
अन्नमयम्      अन्नविकारभूतम्                अन्न से निर्मित
आपोमयः      जलमयः                           जल में परिणत
तेजोमयः        अग्निमयः                         अग्नि का परिणामभूत
अवधार्यम्      अवगन्तव्यम्                     समझने योग्य
विज्ञापयतु      प्रबोधयत                          समझाइये
भूयोऽपि        पुनरपि                    एक बार और
समुदीषति      समुत्तिष्ठति, समुघाति, समुच्छलति             ऊपर उठता है
सर्पिः            घृतम्, आज्यम्                   घी
अश्यमानस्य   भक्ष्यमाणस्य, निगीर्यमाणस्य खाये जाते हुए का
उपदेशान्ते      प्रवचनान्ते                         व्याख्यान के अन्त में
तेजस्वि         तेजोयुक्तम्                         तेजस्विता से युक्त
नौ अधीतम्    आवयोःपठितम्                 हम दोनों द्वारा पढा हुआ


अभ्यासः
1. अधोलिखितानां प्रश्नानामुत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(क) श्वेतकेतुः सर्वप्रथमम् आरुणिं कस्य स्वरूपस्य विषये पृच्छति?
(ख) आरुणिः प्राणस्वरूपं कथं निरूपयति?
(ग) मानवानां चेतांसि कीदृशानि भवन्ति?
(घ) सर्पिः किं भवति?
(ङ) आरुणेः मतानुसारं मनः कीदृशं भवति?
2. (क) स्तम्भस्य पदानि स्तम्भेन दत्तैः पदैः सह यथायोग्यं योजयत
              
मनः              अन्नमयम्
प्राणः            तेजोमयी
वाक्             आपोमयः
(ख) अधोलिखितानां पदानां विलोमपदं पाठात् चित्वा लिखत
(i) गरिष्ठः ............................
(ii) अधः ............................
(iii) एकवारम् ............................
(iv) अनवधीतम् ............................
(v) किञ्चित् ............................
3. उदाहरणमनुसृत्य निम्नलिखितेषु क्रियापदेषु ट्टतुमुन्प्रत्ययं योजयित्वा पदनिर्माणं कुरुत
यथाप्रच्छ् + तुमुन् = प्रष्टुम्
(क) श्रु + तुमुन् = .............................
(ख) वन्द्+ तुमुन् = .............................
(ग) पठ् + तुमुन् = .............................
(घ) कृ + तुमुन् = .............................
(ङ) वि + ज्ञा + तुमुन् = .............................
(च) वि + आ + ख्या + तुमुन् = .............................
4. निर्देशानुसारं रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) अहं किञ्चित् प्रष्टुम् .................। (इच्छ् लट्लकारे)
(ख) मनः अन्नमयं .......................। (भू लट्लकारे)
(ग) सावधानं .................। (श्रु लोट्लकारे)
(घ) तेजस्विनावधीतम् .................। (अस् लोट्लकारे)
(ङ) श्वेतकेतुः आरुणेः शिष्यः .................। (अस् लङ्लकारे)
5. उदाहरणमनुसृत्य वाक्यानि रचयत
यथाअहं स्वदेशं सेवितुम् इच्छामि।
(क) ......................................... उपदिशामि।
(ख) ......................................... प्रणमामि।
(ग) ......................................... आज्ञापयामि।
(घ) ......................................... पृच्छामि।
(ङ) ......................................... अवगच्छामि।
6. (क) सन्धिं कुरुत
(i) अशितस्य + अन्नस्य = ...........................
(ii) इति + अपि + अवधार्यम् = ...........................
(iii) का + इयम् = ...........................
(iv) नौ + अधीतम् = ...........................
(v) भवति + इति = ...........................
वाङ्मनःप्राणस्वरूपम् 89
(ख) स्थूलपदान्यधिकृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(i) मथ्यमानस्य दध्नः अणिमा ऊर्घ्वं समुदीषति।
(ii) भवता घृतोत्पत्तिरहस्यं व्याख्यातम्।
(iii) आरुणिम् उपगम्य श्वेतकेतुः अभिवादयति।
(iv) श्वेतकेतुः वाग्विषये पृच्छति।
7. पाठस्य सारांशं पञ्चवाक्यैः लिखत।


योग्यताविस्तारः
ग्रन्थ परिचयछान्दोग्योपनिषद् उपनिषत्साहित्य का प्राचीन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है। यह सामवेद के उपनिषद् ब्राह्मण का मुख्य भाग है। इसकी वर्णन पद्धति अत्यधिक वैज्ञानिक और युक्तिसंगत है। इसमें आत्मज्ञान के साथसाथ उपयोगी कार्यों और उपासनाओं का सम्यक् वर्णन हुआ है। छान्दोग्योपनिषद् आठ अध्यायों में विभक्त है। इसके छठे अध्याय में ट्टतत्त्वमसिका विस्तार से विवेचन प्राप्त होता है।
भावविस्तारः
आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को उपदेश देते हैं कि खाया हुआ अन्न तीन प्रकार का होता है। उसका स्थिरतम भाग मल होता है, मध्यम मांस होता है, और सबसे लघुतम मन होता है। पिया हुआ जल भी तीन प्रकार का होता हैउसका स्थविष्ठ भाग मूत्र होता है, मध्यभाग लोहित (रक्त) होता है और अणिष्ठ भाग प्राण होता है। भोजन से प्राप्त तेज भी तीन तरह का होता है उसका स्थविष्ठ भाग अस्थि होता है, मध्यम भाग मज्जा (चर्बी) होती है और जो लघुतम भाग है वह वाणी होती है।
जो खाया जाता है वह अन्न है। अन्न ही निश्चित रूप से मन है। न्याय और सत्य से अर्जित किया हुआ अन्न सात्विक होता है। उसे खाने से मन भी सात्विक होता है। दूषित भावना और अन्याय से अर्जित अन्न तामस होता है। कथ्य का सारांश यह है कि सात्विक भोजन से मन सात्विक होता है। राजसी भोजन से मन राजस होता है और तामस भोजन से मन की प्रवृत्ति भी तामसी हो जाती है।
इस संसार में जल ही जीवन है, और प्राण जलमय होता है। तैल (तेल), घृत आदि के भक्षण से वाणी विशद होती है और भाषणादि कार्यों में सामर्थ्य की वृद्धि करती है। इसलिए वाणी को तेजोमयी कहा जाता है। छान्दोग्योपनिषद् के अनुसार मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है।
भाषिकविस्तारः
1. मयट् प्रत्यय प्राचुर्य के अर्थ में प्रयुक्त होता है।
यथापुंल्लिङ्ग स्त्रीलिङ्ग
शान्ति + मयट् शान्तिमयः शान्तिमयी
आनन्द + मयट् आनन्दमयः आनन्दमयी
सुख + मयट् सुखमयः सुखमयी
तेजः + मयट् तेजोमयः तेजोमयी
2. मयट् प्रत्यय का प्रयोग विकार अर्थ में भी किया जाता है।
यथापुंल्लिङ्ग स्त्रीलिङ्ग
मृत् + मयट् मृण्मयः मृण्मयी
स्वर्ण + मयट् स्वर्णमयः स्वर्णमयी
लौह + मयट् लौहमयः लौहमयी
3. जल को जीवन कहा गया है। ट्टट्टजीवयति लोकान् जलम्’’ यह पञ्चभूतों के अन्तर्गत
भूतविशेष है। इसके पर्यायवाची शब्द हैं
वारि, पानीयम्, उदकम्, उदम्, सलिलम्, तोयम्, नीरम्, अम्बु, अम्भस्, पयस् आदि।
जल की उपयोगिता के विषय में निम्नलिखित श्लोक द्रष्टव्य है
पानीयं प्राणिनां प्राणस्तदायत्वं हि जीवनम्।
तोयाभावे पिपासार्तः क्षणात् प्राणै:विमुच्यते।।
4. मनस् (नपुंसक लिङ्ग) शब्द का रूप
प्र.                मनः              मनसी                     मनांसि
द्वि                ’’                ’’                          ’’
तृ.                मनसा           मनोभ्याम्                मनोभिः
च.               मनसे            ’’                          मनोभ्यः
पं.                मनसः           ’’                          ’’
ष.                ’’                मनसोः                    मनसाम्
स.                मनसि           ’’                          मनस्सु
सम्बोधन       हे मनः!         हे मनसी!                 हे मनांसि!
-- अम्भस्, पयस्, यशस्, तेजस्, नभस्, आदि शब्दों के रूप भी मनस् की तरह होते हैं।
अध्येतव्यः ग्रन्थः
उपनिषदों की कहानियाँडॉ. भगवानसिंह, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली।


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