Kabeer Ke Dohon Ki Vyakhya Shabdarthsahit By Avinash Ranjan Gupta

पद्य – 1                         कबीर   
                                                             
                        ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै, औरन कौं सुख होइ।।
शब्दार्थ
1.      वाणी - वचन, बोली
2.      आपा – अहंकार
3.      खोई – खोना
4.      तन – शरीर
5.      सीतल – शीतल, ठंडा
6.      औरन – दूसरों को
7.      कौं – को
            प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कबीर हमें यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि मनुष्य को सदा मीठी वाणी बोलनी चाहिए। मीठी वाणी बोलने से मन का अहंकार लुप्त हो जाता है। मीठी वाणी दूसरों को सुख देने के साथ-साथ वक्ता को भी असीम सुख प्रदान करती  है। मधुर वाणी से रिश्ते मजबूत होते हैं और सभी को सुख-शांति मिलती है।

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखौ नाँहिं।।
शब्दार्थ
1.      कस्तूरी – सुगंधित पदार्थ 
2.      कुंडली – नाभि 
3.      बसै – रहना 
4.      मृग – हिरण 
5.      बन – वन 
6.      माँहि – में 
7.      घटि-घटि – हर जगह
प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कबीर हमें ईश्वर की उपस्थिति के बारे में बताते हुए यह कह रहे हैं कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं। ईश्वर की खोज में यहाँ-वहाँ भटकना सर्वथा व्यर्थ है। अपने कथन को पुष्ट करने के लिए कबीर एक ऐसे मृग का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं जिसके नाभि में कस्तूरी  होता है और उस कस्तूरी से निकलने वाले सुगंध की खोज में मृग (हिरण) पूरे जंगल में चौकड़ी भरती फिरती है। ठीक ऐसी ही स्थिति अज्ञानी मनुष्य की होती है। मनुष्य भी ईश्वर की खोज में मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघरों और गुरुद्वारों में जाता है परंतु ईश्वर तो हमारे अंदर ही निवास करते हैं।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि।।
शब्दार्थ
1.      मैं – अहंकार  
2.      हरि – भगवान  
3.      अँधियारा – अँधेरा  
4.      मिटि – मिट 
5.      दीपक – दीया  
6.      माँहि – मुझमें   
7.      देख्या – देखा 
 प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर हमें अहंकार की उपस्थिति और अनुपस्थिति से होने वाले अंतर के बारे में बताते हुए यह कह रहे हैं कि मनुष्य के अंदर जब अहंकार का निवास होता है तब तक ईश्वर से उसका संगम असंभव होता है। परंतु जैसे ही मनुष्य अपने मन में मानवता रूपी दीपक प्रज्ज्वलित कर लेता है उसके अंदर से अहंकार का गमन हो जाता है और उसके लिए ईश्वर की प्राप्ति रास्ता साफ़ हो जाता है।

सुखिया सब संसार है, खायै अरू सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै।।
शब्दार्थ
1.      सुखिया – सुखी   
2.      खायै – खाए   
3.      अरू – और  
4.      सोवै – सोना  
5.      दुखिया – दुखी   
6.      जागै – जागना    
7.      रोवै – रोना  
            इन पंक्तियों में कबीर हमें यह बता रहे हैं कि संसार के अधिकतर लोग भौतिक (Materialistic) सुख को ही सच्चा सुख मानते हैं और यह अनुभव करते है कि उनके जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया है जबकि कबीर जागते हैं और संसार की इस हालत को देखकर रोते हैं। कबीर को ज्ञान प्राप्त हो गया है। उन्हें यह पता है कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है। जरूरतमंदों की मदद करना ही सच्ची इंसानयित है। जबकि अधिकतर लोग इस ज्ञान से वंचित है और वे भौतिक सुख को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान बैठे हैं।
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ।।
शब्दार्थ
1.      बिरह – वियोग, अलगाव    
2.      भुवंगम – साँप    
3.      बसै – रहता है   
4.      मंत्र – उपाय   
5.      बियोगी – विरही    
6.      जीवै – जीना     
7.      बौरा – पागल   
प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर हमें यह बता रहे है कि राम का भक्त सर्वदा राम के शरण में ही रहना चाहता है। वह किसी भी स्थिति में राम वियोगी नहीं होना चाहता। विरह की स्थिति उसके लिए बहुत कष्टकारक होती है। यह विरह साँप की तरह होता है और यह हमारे तन में ही बसता है। यह विरह रूपी साँप जब काटता है तो कोई भी मंत्र काम नहीं आता है। इस विरह रूपी साँप के काटने पर  मृत्यु निश्चित है अगर किसी कारणवश मृत्यु न भी हो तो राम वियोगी पागल ज़रूर हो जाता है।

निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबण पाँणीं बिना, निरमल करै सुभाइ।।
शब्दार्थ
1.      निंदक – निंदा करने वाला     
2.      नेड़ा – नजदीक, पास     
3.      कुटी – कुटिया, झोंपड़ी    
4.      बँधाई – बनाकर    
5.      साबण – साबुन     
6.      पाँणि – पानी      
7.      सुभाई – स्वभाव    
प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर ने आलोचकों की सराहना करते हुए कहा है कि हमें निंदा करने वाले व्यक्तियों को कभी भी अपना शत्रु नहीं मानना चाहिए क्योंकि उनके आलोचना से हमें अपनी गलतियों और कमियों के बारे में पता चलता है। हमें तो चाहिए कि हम अपने आलोचकों को सदा अपने पास ही रखें और हो सके तो अपने आँगन में ही उनके लिए भी एक कुटिया बना दे। ऐसा करने से वे यदा-कदा हमें हमारी त्रुटियों से  अवगत कराते रहेंगे और हमारा स्वभाव बिना साबुन और पानी के ही निर्मल हो जाएगा।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ऐकै अषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ।।
शब्दार्थ
1.      पोथी – धार्मिक ग्रंथ      
2.      मुवा – मर जाना      
3.      भया – होना     
4.      एकै – एक     
5.      अषिर – अक्षर       
6.      पीव – प्रियतम, प्रेम       
7.      सु – वह     
प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर ने तथाकथित उन विद्वानों का उल्लेख किया है जिन्होंने अनेक मोटे-मोटे ग्रंथ पढ़ डाले और मृत्यु को प्राप्त हुए मगर असल में पंडित नहीं बन पाए। कबीर कहते हैं कि पंडित बनने के लिए मोटे-मोटे ग्रंथ पढ़ने की आवश्यकता नहीं बल्कि प्रेम रूपी एक अक्षर ही काफी है।

हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि।।
शब्दार्थ
1.      हम – मैंने       
2.      जाल्या – जलाया       
3.      आपणाँ – अपना      
4.      मुराड़ा – जलती हुई लकड़ी      
5.      हाथि – हाथ में       
6.      जालौ – जलाऊँगा        
7.      तास का – उसका
8.      जे – जो         
9.      चलै – चले      

प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर कहते हैं कि मैंने ज्ञान रूपी अग्नि से मेरे हृदय के उस घर को जला दिया है जिसमें ईर्ष्या, लालच, क्रोध और भौतिक वस्तुओं के प्रति प्रेम का निवास था। मैंने उस ज्ञान रूपी अग्नि की मशाल अपने हाथ में पकड़ रखी है और अब मैं उन व्यक्तियों के विकारों के घर को जलाऊँगा जो मेरे साथ चलने को तैयार होगा।

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