Hindi Language Promotion and Development: Iirshya Tu Na Gai Mere Mann Se By Avinash Ranjan Gupta

Wednesday, 9 December 2015

Iirshya Tu Na Gai Mere Mann Se By Avinash Ranjan Gupta


शब्दार्थ
1.     ईर्ष्या – जलन/ दाह/ Jealous
2.     सभा – Meeting
3.     मृदुभाषिणी – मधुर बोलने वाली
4.     दरअसल – वास्तव में / Actually
5.     बीमा – Insurance
6.     विभव – ऐश्वर्य
7.     कलेजा- हृदय
8.     मासिक – Monthly
9.     अनोखा – विचित्र
10. वरदान – Boon
11. मौजूद – उपस्थित
12. पक्ष – Favour
13. दंश – डसना
14. लाचार – बेबस
15. वेदना – कष्ट
16. अभाव – कमी
17. निमग्न – सोचते रहना
18. दोष – कसूर
19. चरित्र – Character
20. उन्नति – तरक्की
21. सृष्टि – उत्पत्ति
22. प्रक्रिया – Process
23. उद्यम – कोशिश
24. हानि – क्षति
25. कर्तव्य – फ़र्ज़
26. निंदा – शिकायत
27. अनायास – बिना प्रयास के
28. रिक्त – खाली
29. रिक्थ – संपत्ति
30. ह्रास – कमी
31. निर्मल – स्वच्छ
32. द्वेष – क्लेश
33. मूर्ति – प्रतिमा
34. फिक्र – ज़रूरत
35. गुबार – भड़ास
36. ध्येय – उद्देश्य
37. बदतर – खराब
38. मौलिक – वास्तविक
39. कुंठित – Depressed
40. बनिस्पत – बजाय
41. मद्धिम – कम चमकदार
42. दैत्य – राक्षस
43. सुयश – कीर्ति
44. समकक्ष – बराबर
45. पाक – पवित्र
46. शरीफ़ – भद्र
47. दुर्भावना – बुरी भावना
48. सूत्र – Formula
49. शंका – Doubt
50. ऐब – कमी
51. तरस – Desperate
52. संकीर्ण – तंग / Narrow
53. हस्तियाँ  - Personality
54. शोहरत – Fame
55. मानसिक – Mental
56. अनुशासन – Discipline
57. जिज्ञासा – जानने की कोशिश / Curiosity
58. चुप्पी साधना – मौन धारण करना
59. एकांत – अकेला
60. उपकार # अपकार
61. धरातल – Surface 

                   
पाठ में से
1.     वकील साहब अपने सुख से सुखी नहीं बल्कि अपने पड़ोसी बीमा एजेंट के सुख-वैभव से दुखी थे जो इस बात दर्शाता की ईर्ष्या उनके कलेजे को सदा जलता रहता है।   
2.     ईर्ष्या को अनोखा वरदान कहा गया है क्योंकि जिसके मन में ईर्ष्या घर कर लेती है वह उन चीजों का आनंद  नहीं उठाता जो उसके पास है बल्कि उन वस्तुओं से दुख उठाता है जो दूसरों के पास है। वह अपनी तुलना दूसरों से कर कर पल में खुश और पल में दुखी होता रहता है।   
3.     ईर्ष्या की बेटी निंदा को कहा गया है क्योंकि जिस व्यक्ति में किसी के प्रति ईर्ष्या होती है वह मौका पाते ही दूसरों के सामने उस व्यक्ति की निंदा करने लगता है। उसका मानना है कि ऐसा करने से वह उस व्यक्ति को दूसरों की नज़र में गिरा देगा और खुद लोगों की नज़र में श्रेष्ठ बन जाएगा।
4.     ईर्ष्यालु से बचाने के लिए आपको भीड़ से एकांत की ओर भागना पड़ेगा। आजकल आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ईर्ष्यालु हो चुका है और अगर आप भी ऐसे लोगों की संगति में ज़्यादा समय व्यतीत करने लगे तो आपको भी ईर्ष्या का संक्रमण हो सकता है। बेहतर यही होगा कि आप काम भर ही ऐसे लोगों से बातचीत करें  जिससे न तो रिश्ते में गहराई आए और न ही कड़वाहट।   
5.     ईर्ष्या का लाभदायक पक्ष भी हो सकता है जब सामनेवाले को यह ज्ञात हो कि मुझे ईर्ष्या नहीं बराबरी करनी है या फिर आगे निकालना है। समाज के विकास दर को देखकर खुद यह आकलन लगाना कि मैं कितना पीछे रह गया हूँ या फिर खुद से ही प्रतियोगिता करें और अपने ही बनाए गए कीर्तिमान को तोड़ने के प्रयास में लगे रहे।

समझ की बात
1.     प्रस्तुत कथन का अर्थ यह है कि समाज उन्हीं लोगों को याद करता है जो समाज से लेते बहुत कम हैं पर देते बहुत ज़्यादा हैं। आज तक जितने लोगों ने भी समाज को नई दशा और दिशा प्रदान की है उनके जीवन का अधिकतर समय आत्मचिंतन में ही समर्पित था और यही कारण है कि आज उनका शरीर इस दुनिया में नहीं है परंतु उनकी दी हुई नीतिवाणी अभी भी हमारे दिलों में घर की हुई है।
2.     इस कथन का आशय यह है कि जब भी किसी व्यक्ति की प्रशंसा की जाती है तो उसके अच्छे गुणों के कारण ही की जाती है और उसके अच्छे  गुण ही किसी की आँखों की किरकिरी बन जाती है जिसकी वजह से विकृत मानसिकता के लोग उनसे जलाने लगते हैं।  
3.     चिंता चिता के समान होती है उदाहरण के लिए एक बरगद का विशाल पेड़ जो लगभग 400 साल पुराना है जिसने कितनी बारिश की बूंदों को सहा, कितनी बिजलियों की मार सही, कितने धूप सहे फिर भी वह अचल है पर जब उसके जड़ में दीमक लगने शुरू हुए तो पेड़ का अंत निकट आने लगा। चिंता भी मनुष्य को ठीक उसी प्रकार चिता में बदलने का काम करती है।  
कुछ और भी
1.     । 
2.     किसी से ईर्ष्या करने के मुख्यत: दो ही कारण हो सकते हैं या तो उसमें कुछ ऐसे गुण हैं जो आपमे नहीं या फिर उसमें कुछ ऐसे दुर्गुण है जो आपको पसंद नहीं।  

3.     अपने मन से ईर्ष्या का भाव निकालने के लिए हमें जलन की भावना से नहीं बल्कि बराबरी की भावना से ओत-प्रोत अपने आत्मविकास में लगना चाहिए।