Hindi Language Promotion and Development: Dopahari By Avinash Ranjan Gupta

Wednesday, 9 December 2015

Dopahari By Avinash Ranjan Gupta

शब्दार्थ
1.     नभ – आकाश
2.     तारकोल – अलकतरे वाली
3.     आंगार – अग्निशिखा
4.     छाँह – छाया
5.     झुलस – त्वचा का जल जाना
6.     दीर्घकाय – बड़े शरीरवाला
7.     कंकाल – अस्थि-पंजर Skeleton
8.     अकाल –सूखा / Drought
9.     तांगा – घोड़ागाड़ी
10. चाबुक – Horsewhip   
11. सर्प – साँप
12. सरीखी – की तरह
13. अँगीठी – चूल्हा
14. ग्रामीण – देहाती
15. आत्मा – soul
16. जतन – कोशिश
17. खपरैलों – Tiles
18. चोंच- Beak
19. श्वान – कुत्ता
20. नैन – आँख
21. साँझ - संध्या

पाठ में से
1.     गर्मी की प्रचंडता के कारण पेड़ के पत्ते झुलस गए थे। कुछ वृक्षों के पत्ते तो पूरे झड़ गए थे जिन्हें देखकर ऐसा लग रहा था मानो बड़े-बड़े कंकाल खड़े हों।     
2.     चिड़ियाँ भी जान बचाने के लिए कड़ी धूप में छाया की तलाश में उड़ती फिर रही थी और अंत में घर की खपरैलों के नीचे शरण ले ली।     
3.     चाबुक को साँप के समान बताया गया है क्योंकि जब कोचवान चाबुक घोड़े की गरम पीठ पर चलाता तो वह जिस तरह बलखाती वह ठीक साँप की तरह चाल की तरह है और जितनी पीड़ा साँप के दंशन से होती है उतनी ही पीड़ा घोड़े को चाबुक के मार से होती है।
4.     गर्मी में बड़े घरों के कुत्ते वातानुकूलित कमरों में रहते हैं। बाथरूम में पानी की हल्की ठंडक में आँख मूँदकर लेटे रहते हैं और दूसरी तरफ़ आम आदमी अपने दो वक्त की रोटी के लिए गर्मी की ताप सहने के लिए मजबूर हैं जो इस बात को दर्शाता है कि अमीर घर के कुत्ते आम आदमी से श्रेयस्कर जीवन व्यतीत करते हैं।      
5.     गर्मी मे तारकोल की सड़कें अंगारों के समान जल रही थीं। सड़क की तपिश ऐसी लग रही थी मानो अँगीठी सुलग रही हो।  
कविता में खोजिए  
1.     क. कोई बाहर नहीं निकलता
     साँझ समय तक
     थप्पड़ खाने गरम हवा के
     संध्या की चहल-पहल ओढ़े थी
     गहरे सूने रंग की चादर
     गर्मी के मौसम में।
ख.   गर्मी की दोपहरी में
तपे हुए नभ के नीचे
काली सड़कें तारकोल की
अंगारे-सी जली पड़ी थीं।
ग.     बेदर्दी से पड़ती थी दुबले घोड़े की गरम पीठ पर
भाग रहा वह तारकोल की जली
अँगीठी के ऊपर से।  
कभी एक ग्रामीण धरे कंधे पर लाठी
सुख-दुख की मोटी-सी गठरी
लिए पीठ पर भारी   
कुछ और भी
1.     क. प्रस्तुत पंक्तियों का मूल भाव यह है कि ग्रामीण आदमी अपनी दरिद्रता से आजीवन संघर्ष करता है, हर मौसम की मार झेलता है। अपनी पीठ पर बोझा लादे शहर से गाँव और गाँव से शहर का सफ़र तय करता है।
ख. प्रस्तुत पंक्तियों का केंद्रीय भाव यह है कि गाँव की गरीबी गाँववालों के कर्म और पहनावे से झलकती है। इन पंक्तियों में एक ग्रामीण आदमी के पैर के फटे जूते साफ़-साफ़  शब्दों में उसकी तथा गाँवों की दयनीय अवस्था को चित्रित करती है।   

2.     कविता में दोपहर की प्रचंड गर्मी का वर्णन है इसलिए कविता का नाम दोपहरी रखा गया होगा। मैं इस कविता के लिए अपनी पसंद के दो शीर्षक आज का युग और कुत्ते और इंसान रखना चाहूँगा क्योंकि ये दोनों शीर्षक कविता आद्योपांत (शुरू से अंत तक) का परिभाषित करने में सक्षम हैं।