Hindi Language Promotion and Development

Friday, 24 July 2015


बोध—प्रश्न
1. ‘उनाकोटी’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए बतलाएँ कि यह स्थान इस नाम से क्यों प्रसिद्ध है?
2. पाठ के संदर्भ में उनाकोटी में स्थित गंगावतरण की कथा को अपने शब्दों में लिखिए।
3. कल्लू कुम्हार का नाम उनाकोटी से किस प्रकार जुड़ गया?
4. ‘मेरी रीढ़ में एक झुरझुरी—सी दौड़ गई’- लेखक के इस कथन के पीछे कौन—सी घटना जुड़ी है?
5. त्रिपुरा ‘बहुधार्मिक समाज’ का उदाहरण कैसे बना?
6. टीलियामुरा कस्बे में लेखक का परिचय किन दो प्रमुख हस्तियों से हुआ? समाज—कल्याण के कार्यों में उनका क्या योगदान था?
7. कैलासशहर के ज़िलाधिकारी ने आलू की खेती के विषय में लेखक को क्या जानकारी दी?
8. त्रिपुरा के घरेलू उघोगों पर प्रकाश डालते हुए अपनी जानकारी के कुछ अन्य घरेलू उघोगों के विषय में बताइए?






1. उनाकोटी का मतलब है एक कोटि, यानी एक करोड़ से एक कम। दंतकथा के अनुसार उनाकोटी में शिव की एक कोटि से एक कम मूर्तियाँ हैं। पहाड़ों को अंदर से काटकर यहाँ विशाल आधार—मूर्तियाँ बनी हैं। यह भारत के सबसे बड़े शैव तीर्थों में से एक है। यहाँ आदिवासी धर्म फलते-फूलते हैं। यह स्थान जंगल के काफी भीतर है। यहाँ के मूर्तियों के निर्माता कल्लू कुम्हार माने जाते हैं। वह पार्वती का भक्त था और शिव—पार्वती के साथ उनके निवास कैलाश पर्वत पर जाना चाहता था। पार्वती के जोर देने पर शिव कल्लू को कैलाश ले चलने को तैयार हो गए लेकिन इसके लिए शर्त यह रखी कि उसे एक रात में शिव की एक कोटि मूर्तियाँ बनानी होंगी। कल्लू अपनी धुन के पक्के व्यक्ति की तरह इस काम में जुट गया। लेकिन जब भोर हुई तो मूर्तियाँ एक कोटि से एक कम निकलीं। कल्लू नाम की इस मुसीबत से पीछा छुड़ाने पर अड़े शिव ने इसी बात को बहाना बनाते हुए कल्लू कुम्हार को अपनी मूर्तियों के साथ उनाकोटी में ही छोड़ दिया और चलते बने।

2. पहाड़ों को अंदर से काटकर यहाँ विशाल आधार—मूर्तियाँ बनी हैं। एक विशाल चट्टान ऋषि भगीरथ की प्रार्थना पर स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगा के अवतरण के मिथक को चित्रित करती है। गंगा अवतरण के धक्के से कहीं पृथ्वी धँसकर पाताल लोक में न चली जाए, लिहाज़ा शिव को इसके लिए तैयार किया गया कि वे गंगा को अपनी जटाओं में उलझा लें और इसके बाद इसे धीरे—धीरे पृथ्वी पर बहने दें। शिव का चेहरा एक समूची चट्टान पर बना हुआ है और उनकी जटाएँ दो पहाड़ों की चोटियों पर फैली हैं। भारत में शिव की यह सबसे बड़ी आधार—मूर्ति है। पूरे साल बहने वाला एक जल प्रपात पहाड़ों से उतरता है जिसे गंगा जितना ही पवित्र माना जाता है।

3. यह पूरा इलाका ही शब्दशः देवियों—देवताओं की मूर्तियों से भरा पड़ा है। इन आधार—मूर्तियों के निर्माता अभी चिह्नित नहीं किए जा सके हैं। स्थानीय आदिवासियों का मानना है कि इन मूर्तियों का निर्माता कल्लू कुम्हार था। वह पार्वती का भक्त था और शिव—पार्वती के साथ उनके निवास कैलाश पर्वत पर जाना चाहता था। पार्वती के जोर देने पर शिव कल्लू को कैलाश ले चलने को तैयार हो गए लेकिन इसके लिए शर्त यह रखी कि उसे एक रात में शिव की एक कोटि मूर्तियाँ बनानी होंगी। कल्लू अपनी धुन के पक्के व्यक्ति की तरह इस काम में जुट गया। लेकिन जब भोर हुई तो मूर्तियाँ एक कोटि से एक कम निकलीं। कल्लू नाम की इस मुसीबत से पीछा छुड़ाने पर अड़े शिव ने इसी बात को बहाना बनाते हुए कल्लू कुम्हार को अपनी मूर्तियों के साथ उनाकोटी में ही छोड़ दिया और चलते बने। इस प्रकार उनाकोटि की मूर्तियों के निर्माता के रूप में कल्लू कुम्हार को प्रसिद्धि मिली और उसका नाम उनकोटि से जुड़ गया।

4. त्रिपुरा के हिंसाग्रस्त मुख्य भाग में प्रवेश अंतिम पड़ाव टिलियामुरा ही है। राष्ट्रीय राजमार्ग – 44 पर अगले 83 किलोमीटर यानी मनु तक की यात्रा के दौरान ट्रैफिक सी.आर.पी.एफ़ की सुरक्षा में काफ़िले की शक्ल में चलता है। काफ़िला दिन में 11 बजे के आसपास चलना शुरू हुआ। मैं अपनी शूटिंग के काम में ही इतना व्यस्त था कि उस समय तक डर के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं थी जब तक निचली पहाड़ियों पर इरादतन रखे दो पत्थरों की तरफ़ मेरा ध्यान आकृष्ट नहीं किया। “दो दिन पहले हमारा एक जवान यहीं विद्रोहियों द्वारा मार डाला गया था”, सुरक्षा कर्मी ने लेखक से कहा यह सुनते ही लेखक की रीढ़ में एक झुरझुरी सी दौड़ गई। मनु तक की अपनी शेष यात्रा का यह खयाल लेखक अपने दिल से निकाल नहीं पाया कि हमें घेरे हुए सुंदर और अन्यथा शांतिपूर्ण प्रतीत होने वाले जंगलों में किसी जगह बंदूकें लिए विद्रोही भी छिपे हो सकते हैं।।

5. त्रिपुरा में लगातार बाहरी लोगों के आने से यह राज्य बहुधार्मिक समाज का उदाहरण बना है। त्रिपुरा में उन्नीस अनुसूचित जनजातियों और विश्व के चारों बड़े धर्मों का प्रतिनिधित्व मौजूद है। अगरतला के बाहरी हिस्से पैचारथल में एक सुंदर बौद्ध मंदिर है जिससे पता चलता है कि त्रिपुरा के उन्नीस कबीलों में से दो, यानी चकमा और मुघ महायानी बौद्ध हैं। ये कबीले त्रिपुरा में बर्मा या म्यांमार से चटगाँव के रास्ते आए थे। दरअसल इस मंदिर की मुख्य बुद्ध प्रतिमा भी 1930 के दशक में रंगून से लाई गई थी।–

6. टीलियामुरा शहर में लेखक की मुलाकात हेमंत कुमार जमातिया से हुई जो यहाँ के एक प्रसिद्ध लोकगायक हैं और जो 1996 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत भी हो चुके हैं। हेमंत कोकबारोक बोली में गाते हैं जो त्रिपुरा की कबीलाई बोलियों में से है। जवानी के दिनों में वे पीपुल्स लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन के कार्यकर्ता थे। लेकिन जब उनसे मेरी मुलाकात हुई तब वे हथियारबंद संघर्ष का रास्ता छोड़ चुके थे और चुनाव लड़ने के बाद ज़िला परिषद् के सदस्य बन गए थे । टीलियामुरा शहर के वार्ड नं. 3 में लेखक की मुलाकात एक और गायक मंजु ऋषिदास से हुई। ऋषिदास मोचियों के एक समुदाय का नाम है। लेकिन जूते बनाने के अलावा इस समुदाय के कुछ लोगों की विशेषज्ञता थाप वाले वाद्यों जैसे तबला और ढोल के निर्माण और उनकी मरम्मत के काम में भी है। मंजु ऋषिदास आकर्षक महिला थीं और रेडियो कलाकार होने के अलावा नगर पंचायत में अपने वार्ड का प्रतिनिधित्व भी करती थीं। वे निरक्षर थीं। लेकिन अपने वार्ड की सबसे बड़ी आवश्यकता यानी स्वच्छ पेयजल के बारे में उन्हें पूरी जानकारी थी। नगर पंचायत को वे अपने वार्ड में नल का पानी पहुँचाने और इसकी मुख्य गलियों में ईंटें बिछाने के लिए राज़ी कर चुकी थीं

7. ज़िलाधिकारी केरल के एक नौजवान थे। वे तेज़तर्रार, मिलनसार और उत्साही व्यक्ति थे। उन्होंने बताया कि टी.पी.एस. (टरू पोटेटो सीड्स) की खेती को त्रिपुरा में, खासकर उत्तरी ज़िले में किस तरह सफलता मिली है। आलू की बुआई के लिए आमतौर पर पारंपरिक आलू के बीजों की ज़रूरत दो मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर पड़ती है। इसके बरक्स टी.पी.एस की सिर्फ़ 100 ग्राम मात्रा ही एक हेक्टेयर की बुआई के लिए काफ़ी होती है। त्रिपुरा से टी.पी.एस. का निर्यात अब न सिर्फ़ असम, मिज़ोरम, नागालैंड और अरूणाचल प्रदेश को, बल्कि बांग्लादेश, मलेशिया और विएतनाम को भी किया जा रहा है।

8. त्रिपुरा में आलू की खेती के साथ-साथ यहाँ की लोकप्रिय घरेलू गतिविधियों में से एक है अगरबत्तियों के लिए बाँस की पतली सींकें तैयार करना। अगरबत्तियाँ बनाने के लिए इन्हें कर्नाटक और गुजरात भेजा जाता है । अन्य घरेलू उद्योगों में माचिस, साबुन, प्लास्टिक, स्टील,लकड़ी आदि के घरेलू उद्योग सर्वप्रसिद्ध है । घरेलू आवश्यकता दिन-प्रतिदिन बढ़ती चली जा रही है जिससे उद्योगों में भी प्रतिद्वंद्विता की भावना बढ़ती जा रही है।







मौखिक
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक—दो पंक्तियों में दीजिए-
1- अतिथि कितने दिनों से लेखक के घर पर रह रहा है?
2- कैलेंडर की तारीखें किस तरह फड़फड़ा रही हैं?
3- पति—पत्नी ने मेहमान का स्वागत कैसे किया?
4- दोपहर के भोजन को कौन—सी गरिमा प्रदान की गई?
5- तीसरे दिन सुबह अतिथि ने क्या कहा?
6- सत्कार की ऊष्मा समाप्त होने पर क्या हुआ?

1. अतिथि लेखक के घर पर पिछले चार दिनों से रह रहा है।
2. कैलेंडर की तारीखें अपनी सीमा में नम्रता से पंछी की तरह फड़फड़ा रही है।
3. पति-पत्नी ने भीगी मुस्कान से मेहमान को गले लगाकर उसका स्वागत किया। रात के भोजन में दो प्रकार की सब्जियाँ, रायता और मीठी चीज़ों का भी प्रबंध किया गया।
4. दोपहर के भोजन को लंच की गरिमा प्रदान की गई।
5. तीसरे दिन सुबह अतिथि ने लोंड्री में कपड़े देने को कहा क्योंकि वह अपने कपड़े धुलवाना चाहता था।
6. सत्कार की ऊष्मा समाप्त होने पर डिनर के स्थान पर खिचड़ी बनने लगी। खाने में सादगी आ गई और अगर वह नहीं जाता तो उपवास तक रखना पड़ सकता था।

लिखित
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए-
1- लेखक अतिथि को कैसी विदाई देना चाहता था?
2- पाठ में आए निम्नलिखित कथनों की व्याख्या कीजिए-
(क) अंदर ही अंदर कहीं मेरा बटुआ काँप गया।
(ख) अतिथि सदैव देवता नहीं होता, वह मानव और थोडे़ अंशों में राक्षस भी हो सकता है।
(ग) लोग दूसरे के होम की स्वीटनेस को काटने न दौड़ें।
(घ) मेरी सहनशीलता की वह अंतिम सुबह होगी।
(ङ) एक देवता और एक मनुष्य अधिक देर साथ नहीं रहते।



1. लेखक अतिथि को भावपूर्ण विदाई देना चाहता था। वह अतिथि का भरपूर स्वागत कर चुका था। प्राचीनकाल में कहा जाता था,“अतिथि देवो भव” लेखक ने इस कथन की मर्यादा रखी। वह चाहता था कि जब अतिथि विदा हो तब वह और उसकी पत्नी उसे स्टेशन तक छोड़ने जाएँ। वह उसे सम्मानजनक विदाई देना चाहता था।
2. –
क. लेखक के घर में जब अतिथि बिना सूचना दिए आ गया तो उसे लगा कि उसका बटुआ हल्का हो जाएगा। उसके हृदय में बेचैनी हो रही थी कि अतिथि का स्वागत किस प्रकार किया जाए। अपनी तरफ़ से लेखक ने अच्छी खातिरदारी का हर संभव प्रयास किया। बावजूद इसके अतिथि जाने का नाम ही नहीं ले रहा था। इतने दिनों की मेहमाननवाज़ी में लेखक का बटुआ बहुत हल्का हो चुका था।
ख. आज के युग में अगर अतिथि बिना तिथि के आ जाए तो वह अपना देवत्व अधिकांश मात्रा में खो देता है और अगर कुछ दिन रहने के बाद भी वह जाने का नाम न ले तो वह अपना देवत्व पूर्णत: खोकर लापरवाह आदमी और बाद में राक्षस का रूप धारण कर लेता है।
ग. सभी लोग अपने घर की स्वीटनेस को बरकरार रखना चाहते हैं परंतु बिना तिथि के आया हुआ अतिथि इस स्वीटनेस को बिटरनेस में तब्दील कर देता है। ऐसे में अतिथि को चाहिए कि समझदार बनते हुए कम से कम इतना विचार तो ज़रूर करे कि उसके आने से मेज़बान की दिनचर्या में बदलाव आ गया है और यथासंभव भावपूर्ण विदाई लेकर चला जाए।
घ. लेखक का मानना है कि यदि अतिथि एक-दो दिन के लिए ठहरे तो उसका आदर-सत्कार होगा परंतु अगर वह इस दिवस सीमा को पार करता है तो मेज़बान की सहनशीलता टूट जाती है। मेज़बान दिन में कई बार मूक भाषा में अतिथि को ‘गेट-आउट’ कहता है और आतिथ्य-सत्कार का मानो अंत-सा हो जाता है।
ङ. अतिथि को देवता के समान कहा गया है। यदि देवता मनुष्य के साथ ज़्यादा समय तक रहे तो उसका देवत्व समाप्त हो जाता है क्योंकि देवता थोड़े देर के लिए ही दर्शन देकर चले जाते हैं। मनुष्य और देवता में ईर्ष्या-द्वेष की भावना नहीं होती है परंतु यह तब तक ही संभव है जब तक समय सीमा को परिस्थितियाँ प्रभावित न करें।


लिखित
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50-60 शब्दों में) लिखिए-
1- कौन—सा आघात अप्रत्याशित था और उसका लेखक पर क्या प्रभाव पड़ा?
2- ‘संबंधों का संक्रमण के दौर से गुज़रना’- इस पंक्ति से आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।
3- जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो लेखक के व्यवहार में क्या—क्या परिवर्तन आए?


1. मेहमानों का बिना बताए मेज़बान के घर चले आने का आघात अप्रत्याशित था और उनके द्वारा तरह-तरह की फरमाइशें इस आघात को और भी व्याघात पहुँचाता है। बिना तिथि के अतिथि के आने से एक तो लेखक की दिनचर्या में काफी परिवर्तन आया। दूसरा, लेखक और उसकी पत्नी के बीच भी अनबन होने लगी और सबसे महत्त्वपूर्ण तो यह कि अतिथि के आने से लेखक का बटुआ हल्का हो गया।
2. ‘संक्रमण’ का अर्थ है- बदलाव। इस पंक्ति के माध्यम से लेखक यह कहना चाहते है कि अतिथि और उनके बीच का रिश्ता इसी संक्रमण के दौर से गुज़र रहा है जो धीरे- धीरे मधुरता से कड़वाहट में परिवर्तित हो रहा है। सत्कार की ऊष्मा समाप्त हो गई है और अब यह तिरस्कार का रूप धारण करने वाला है।
3. जब अतिथि चार दिन तक नहीं गया तो लेखक के व्यवहार में निम्नलिखित परिवर्तन आए –
i. खाने का स्तर डिनर से गिरकर खिचड़ी तक आ पहुँचा।
ii. लेखक अतिथि को गेट आउट कहने को भी तौयार हो गया।
iii. लेखक को अतिथि राक्षस के समान लगने लगा।
iv. अब अतिथि के प्रति सत्कार की भावना लुप्त-सी हो गई।
v. भावनाएँ गालियों का स्वरूप धारण करने लगीं।















बोध—प्रश्न
1. भाई के बुलाने पर घर लौटते समय लेखक के मन में किस बात का डर था?
2. मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली रास्ते में पड़ने वाले कुएँ में ढेला क्यों फेंकती थी?
3. ‘साँप ने फुसकार मारी या नहीं, ढेला उसे लगा या नहीं, यह बात अब तक स्मरण नहीं’ – यह कथन लेखक की किस मनोदशा को स्पष्ट करता है?
4. किन कारणों से लेखक ने चिट्ठियों को कुएँ से निकालने का निर्णय लिया?
5. साँप का ध्यान बँटाने के लिए लेखक ने क्या—क्या युक्तियाँ अपनार्इं?
6. कुएँ में उतरकर चिट्ठियों को निकालने संबंधी साहसिक वर्णन को अपने शब्दों में लिखिए।
7. इस पाठ को पढ़ने के बाद किन—किन बाल—सुलभ शरारतों के विषय में पता चलता है?
8. ‘मनुष्य का अनुमान और भावी योजनाएँ कभी—कभी कितनी मिथ्या और उलटी निकलती हैं’ - का आशय स्पष्ट कीजिए।
9. ‘फल तो किसी दूसरी शक्ति पर निर्भर है’ - पाठ के संदर्भ में इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।






1. लेखक जब झरबेरी के बेर तोड़—तोड़कर खा रहा था तभी गाँव के पास से एक आदमी ने ज़ोर से पुकारा कि तुम्हारे भाई बुला रहे हैं, शीघ्र ही घर लौट जाओ। लेखक घर को चल दिया पर उनके मन में डर था। उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि उससे कौन-सा कसूर हो गया है? उसे यह आशंका थी कि कहीं बेर खाने के अपराध में तो पेशी नहीं हो रही है। उसे बड़े भाई की मार का डर था। वह डरते—डरते घर में घुसा।।

2. मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली पूरी बानर टोली थी। उन बच्चों को पता था कि कुएँ में साँप है । वे कुएँ में ढेला फेंककर कुएँ से आनेवाली क्रोधपूर्ण फुसकार सुनने का मज़ा लेते थे। उसे सुनने के बाद अपनी बोली की प्रतिध्वनि सुनने की लालसा के कारण मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली बच्चों की टोली कुएँ में ढेला फेंकती थी।

3. लेखक के साथ यह घटना सन्1908 में घटी थी जिसे लेखक ने सन् 1915 में अपनी माँ को बताया था। लेखक ने जब ढेला उठाकर कुएँ में फेंका तब टोपी में रखी तीनों चिट्ठियाँ चक्कर काटती हुई कुएँ में गिर गईं। लेखक की तो जान ही निकल गई। वह बुरी तरह घबरा गया था और अपने होश खो बैठा था।उसे ठीक से यह भी याद नहीं कि साँप ने फुसकार मारी या नहीं, ढेला उसे लगा या नहीं यह बात अब तक स्मरण नहीं।

4. लेखक को चिट्ठियाँ बड़े भाई ने दी थीं। यदि चिट्ठियाँ डाकखाने में नहीं डाली जातीं तो घर में मार पड़ती। सच बोलकर पिटने का भय और झूठ बोलकर चिट्ठियों के न पहुँचने की ज़िम्मेदारी का बोध उसे लगातार परेशान कर रहा था। उनका मन तो कहीं भाग जाने का हो रहा था मगर ऐसा करना उनके लिए संभव नहीं था। अंत में लेखक ने कुएँ से चिट्ठी निकालने का निर्णय कर ही लिया।

5. साँप का ध्यान बाँटने के लिए लेखक ने निम्नलिखित युक्तियाँ अपनार्इं –
i. उसने डंडे से साँप को दबाने का ख्याल छोड़ दिया।
ii. उसने साँप का फन पीछे होते ही अपना डंडा चिट्ठियों की ओर कर दिया और लिफ़ाफ़ा उठाने की कोशिश की।
iii. डंडा लेखक की ओर खींच आने से साँप के आसन बदल गए और लेखक चिट्ठियाँ चुनने में कामयाब हो गया।

6. लेखक की चिट्ठियाँ कुएँ में गिरी पड़ी थीं। कुएँ में उतरकर चिट्ठियाँ निकाल लाना साहस का कार्य था। लेखक ने इस चुनौती को स्वीकार किया और उसने छ: धोतियों को जोड़कर डंडा बाँधा और एक सिरे को कुएँ में डालकर उसके दूसरे सिरे को कुएँ के चारों ओर घूमाने के बाद उसमें गाँठ लगाकर छोटे भाई को पकड़ा दिया। धोती के सहारे जब वह कुएँ के धरातल से चार-पाँच गज़ ऊपर था, उसने देखा साँप फन फैलाए लेखक के नीचे उतारने का इंतज़ार कर रहा था। साँप को धोती में लटककर नहीं मारा जा सकता था। डंडा चलाने के लिए भी काफी जगह नहीं थी इसलिए उसने डंडा चलाने का इरादा छोड़ दिया। लेखक ने डंडे से चिट्ठियों को खिसकाने का प्रयास किया कि साँप डंडे से चिपक गया। साँप का पिछला भाग लेखक को छू गया। लेखक ने डंडे को एक ओर पटक दिया। देवी माँ की कृपा से साँप के आसन बदल गए और लेखक चिट्ठियाँ सउठाने में सफल हो गया।

7. बच्चे कौतूहल प्रिय और जिज्ञासु प्रवृति के होते हैं। उनकी जिज्ञासा और पीड़ा कभी-कभी उनको निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा कर देती है। इस पाठ में लेखक उनके छोटे भाई और मित्रों की बाल – सुलभ शरारतों का भी पता चलता है जो कुछ इस प्रकार की हैं-
i. बच्चे झरबेरी से बेर तोड़कर खाने का आनंद लेते हैं।
ii. कठिन व जोखिमपूर्ण कार्य करते हैं।
iii. माली से छुप-छुपकर पेड़ों से आम तोड़ना पसंद करते हैं।
iv. बच्चे स्कूल जाते समय रास्ते में शरारत करते हैं।
v. बच्चे कुएँ में ढेला फेंककर खुश होते हैं।
vi. वे जानवरों को तंग करते हैं।

8. मनुष्य हर स्थिति से निबटने के लिए अपना अमुमान लगाता है। वह अपने अनुमान के आधार पर भविष्य की योजनाएँ बनाता है पर ये योजनाएँ हर बार सफल नहीं हो पातीं। कई बार तो स्थिति बिलकुल उल्टी होती है जैसा कि इस पाठ में वर्णित है। लेखक की चिट्ठियाँ कुएँ में गिर जाती हैं और वह कुएँ के अंदर जाकर चिट्ठियाँ लाने का निर्णय करता है। कुएँ में घुसने से पहले उसने कई योजनाएँ बना रखी थीं जैसे कि नीचे उतरते ही पहले वह साँप को डंडे से मार देगा और चिट्ठियाँ उठा लेगा। परंतु नीचे उतरने के बाद तो पूरा समीकरण ही बदल गया। इससे यह पता चलता है कि मनुष्य की कल्पना और वास्तविकता में बहुत अंतर होता है।

9. मनुष्य कर्म तो करता है परंतु फल पर उसका अधिकार नहीं होता। मनुष्य को चाहिए के बिना फल की आशा रखे कर्म करें। अगर उसके कर्म में पवित्रता होगी और कर्म के पीछे किसी श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति का उद्देश्य होगा तो अवश्य ही सुखद फल प्राप्त होगा। इस पाठ में भी लेखक ने चिट्ठियाँ प्राप्त करने के लिए भरसक प्रयास किया और उसे सफलता मिली। गीता में भी लिखा है,”कर्मण्येव वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्”










प्रश्न—अभ्यास
1 -निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए -
(क) पहले छंद में कवि की दृष्टि आदमी के किन—किन रूपों का बखान करती है? क्रम से लिखिए।
(ख) चारों छंदों में कवि ने आदमी के सकारात्मक और नकारात्मक रूपों को परस्पर किन—किन रूपों में रखा है? अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
(ग) ‘आदमी नामा’ शीर्षक कविता के इन अंशों को पढ़कर आपके मन में मनुष्य के प्रति क्या धारणा बनती है?
(घ) इस कविता का कौन—सा भाग आपको सबसे अच्छा लगा और क्यों?
(ङ) आदमी की प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।



1. पहले छंद में कवि की दृष्टि मानव के निम्नलिखित रूपों का बखान करती हैं-
बादशाह, गरीब व दरिद्र, मालदार, स्वादिष्ट भोजन खाने वाला, रूखा-सूखा खाने वाला।
2. कवि ने आदमी के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों का तुलनात्मक प्रस्तुतीकरण किया है, वे रूप इस प्रकार हैं-
सकारात्मक नकारात्मक
बादशाह गरीब व दरिद्र
मालदार कमजोर
स्वादिष्ट भोजन खाने वाला रूखा-सूखा खाने वाला
चोर पर निगाह रखने वाला जूतियाँ चुराने वाला
जान न्योछावर करने वाला जान लेने वाला
सहायता करने वाला अपमान करने वाला
शरीफ लोग कमीने लोग
अच्छे लोग बुरे लोग
3. आदमीनामा शीर्षक कविता के इन अंशों को पढ़कर हम इसी नतीजे पर पहुँचते हैं कि मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है और अगर वह परिस्थितियों के सामने घुटने टेक देता है तो उसे हर अवस्था में समझौता करने की आदत पड़ जाती है। वह चाह कर भी फिर अपने मन की नहीं कर पाता यही कारण है कि कुछ लोग आश्रित या परजीवी होकर अपना जीवन बिता देते हैं और कुछ लोग अपने जीवन को मिसाल बना देते हैं।
4. ।
5. प्रत्येक आदमी शारीरिक बनावट और सोच के आधार पर अलग-अलग होते हैं। कुछ आदमी समस्या को जीवन का संघर्ष मानकर उससे लड़ते हैं। समस्या को एक चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और उनका डट कर सामना करते हैं। इसी दुनिया में कुछ व्यक्ति ऐसे भी हैं जो मुसीबतों को विकट समस्या मानकर ईश्वर का आश्रय लेते हैं। ये विश्वास से ज़्यादा भाग्य पर भरोसा करते हैं। मेरा तो यह मानना है कि मनुष्य अपनी उम्दा सोच और क्रियाओं के द्वारा ही जग में अपना नाम अमर कर पाता है।


2 -निम्नलिखित अंशों की व्याख्या कीजिए -
(क) दुनिया में बादशाह है सो है वह भी आदमी
और मुफ़लिस—ओ—गदा है सो है वो भी आदमी
(ख) अशराफ़ और कमीने से ले शाह ता वज़ीर
ये आदमी ही करते हैं सब कारे दिलपज़ीर


1. प्रस्तुत पंक्तियों में कवि आदमी के भिन्न-भिन्न रूपों पर प्रकाश डालते हुए कह रहे हैं कि इस दुनिया में तरह-तरह के आदमी हैं। जो आवाम का बादशाह बना बैठा है वह भी आदमी है और उसके पास दुनिया भर की दौलत एशों-आराम हैं। दूसरी तरफ़ जो बिलकुल गरीब और भिखारी हैं वे भी आदमी ही हैं। ।
2. कवि अपनी इन पंक्तियों में इंसानों की फिदरत का ज़िक्र करते हुए कह रहे हैं कि इस दुनिया में कुछ आदमी शरीफ भी हैं और कुछ अव्वल दर्ज़े के कमीने भी। बादशाह से लेकर मंत्री तक सारे मनमाने काम करने वाले आदमी ही हैं। इनके कृत्य कभी सराहनीय होते हैं और कभी निंदनीय। ।



3 -निम्नलिखित में अभिव्यक्त व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए -
(क) पढ़ते हैं आदमी ही कुरआन और नमाज़ यां
और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियाँ
जो उनको ताड़ता है सो है वो भी आदमी
(ख) पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुनके दौड़ता है सो है वो भी आदमी




क. कवि कहते हैं कि जहाँ पर धर्म की बातें सिखाईं जाती हैं वहीं से जूते-चप्पल चुरा लिए जाते हैं और चुराने वाला चोर भी आदमी ही होता है और उनको देखने वाला भी आदमी ही होता है। अर्थात समाज में समुचित शिक्षा के विविध आयामों में खामियाँ हैं जिसकी वजह से ये सब क्रियाएँ हो रही हैं।

ख. कवि कहते हैं कि लोग अपनी अज्ञानता के कारण दूसरों को बेइज़्ज़त करते हैं। यही लोग अपनी समस्या में सहायता के उद्देश्य से चिल्ला कर लोगों को पुकारते हैं और उनकी पुकार को सुनकर मदद की मंशा से जो दौड़ता है वह भी आदमी ही है।इससे यह तो स्पष्ट होता है कि समाज में अनेक तरह के लोग मौजूद हैं पर हमे यह चाहिए कि हम अपनी सोच और सामाजिक स्तर इस तरह का बनाए कि कोई हमारी बेइज़्ज़ती न कर सके। हमें अपने आप को इस काबिल बनाना चाहिए कि हम दूसरों की भी मदद कर सकें।